राजनीति

क्या राम को लाने वाले अब सत्ता से विदा होंगे?- शैलेश तिवारी

लेख

क्या राम को लाने वाले अब सत्ता से विदा होंगे ?

शैलश तिवारी

दुनिया भर में जितने भी देश हैं… हर देश की अपनी एक खासियत होती है। उस विशेषता के लिए वहाँ की सरकार हो या जनता … सभी हर तरह का बलिदान देने को तैयार होते हैं। दूसरे शब्दों में इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं कि उस खासियत या विशेषता में वहाँ के लोगों के प्राण बसते हैं। उससे उन्हें इतना मोह होता है कि उस खासियत पर आँच आए तो उस संबंधित देश की जनता कुछ भी कर गुजरने का जज्बा उसके दिल में पैबस्त होता है।

बात को और अधिक आसानी से समझने के लिए कुछ देशों की विशेषताओं पर गौर करते हैं। जैसे सूर्य के उदय होने के देश कहा जाने वाला जापान… वहाँ के निवासियों को सबसे ज्यादा प्यार है राष्ट्र से…. राष्ट्रीयता जापानियों की पहचान है और वह भी इतनी जबरदस्त कि कोई पिता देश से गद्दारी करे तो उसका बेटा ही उसको गोली मार सकता है।
फ्रांस … वैसे तो यहाँ के लोग बहुत तरह की खासियत रखते हैं लेकिन इसकी राजधानी पेरिस के लोग फैशन के दीवानगी की हद तक दीवाने होते हैं। वो भी ऐसे कि मौसम को बदलने में वक्त लग सकता है लेकिन वहाँ पर फैशन बदलने में ज्यादा समय नहीं लगता।
इसी तरह से इंग्लैंड की चर्चा भी वहाँ के लोगों में अपने देश की परंपराओं के प्रति लगाव से लगाई जा सकती है। दुनिया भर से राजशाही लगभग समाप्त हो चुकी है लेकिन इंग्लैंड में लोकतंत्र भी है और राजशाही भी… राजशाही भी ऐसी कि राज परिवार के महल बकिंघम पैलेस में होने वाली छोटी से छोटी घटना आज भी वहाँ के अखबारो की सुर्खियां बन जाती है। यानि इंग्लैंड के नागरिक अपनी परंपराओं से बेहद प्यार करते हैं।
दुनिया की सुपर पावर कहे जान वाले अमेरिका के लोग पूंजीवादी मानसिकता के हैं। वह भी इतने कि पूंजी को बिना बात खर्च करने वाला शासक भी बहुत अच्छे काम करने के बाद भी अगला चुनाव हार सकता है और ऐसा कई बार वहाँ की जनता ने कर दिखाया है।
अब बात करते हैं हमारे अपने देश की खासियत की… उस विशेषता की जिसमें यहाँ की जनता के प्राण बसते हैं। वह भी इतने कि उस विशेषता के लिए युद्ध भी लड़े जाते हैं और सत्ता भी बदली जाती हैं।
शस्य श्यामला भूमि कहने वाली भारत की माटी की सबसे बड़ी खासियत है यहाँ के निवासियों का धर्म के प्रति अगाध प्रेम, श्रद्धा , आस्था और अटूट विश्वास। इसके भी कुछ प्रमाणिक उदाहरण आपके समक्ष प्रस्तुत हैं।
अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की पहली लड़ाई माना जाने वाला 1857 में हुआ स्वाधीनता संग्राम…. जिसकी प्रथम चिंगारी धर्म के कारण ही प्रज्वलित हुई … जब कारतूसों में चर्बी का जिक्र प्रकाश में आया तो अंग्रेजी सेना के सैनिकों ने ही धर्म भ्रष्ट हो जाने के भय से ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत का बिगुल फूँक दिया।
देश जब ब्रिटिश साम्राज्य से आजाद होने के मुकाम पर आया तो देश को बँटवारे का दंश झेलना पड़ा… वह भी धर्म के आधार पर।
देश में संचार क्रांति के जनक, 18 साल के नौजवानों को सरकार चुनने का हक देने वाली सरकार के पतन का एक कारण कमण्डल की धार्मिक राजनीति भी बनी।
कालांतर में अटल जी की सरकार हो या मोदी जी की सरकार धर्म के आधार पर ही सत्ता का सुख भोगने के काबिल बन पाई।
बल्कि देश भर में यह नैरेटिव भी सफलता पूर्वक अपना काम कर गया कि जो राम को लायें हैं हम उनको ही लाएंगे।

लब्बोलुआब यह कि भारत की पहचान यहाँ के निवासियों का धर्म के प्रति लगाव है। अब बात उस मूल बिंदु की जिसके लिए उक्त सब लिखा गया। वह यह कि वर्तमान में राम जन्म भूमि मंदिर के दान/चढ़ावे में और अन्य वित्तीय मामलों में जो राज रोज खुल रहे हैं। उसको लेकर राम मंदिर का शिलान्यास कारण से लेकर शिखर का ध्वजारोहण करने तक की सुर्खियां बटोरने वाले बोलने की कला में निपुण यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी और उनकी मातृ संस्था के प्रमुख मोहन भागवत जी मौन क्यों हैं? यह सवाल ज्यादा नहीं तो हर साधारण बुद्धि रखने वाले के दिमाग में शोर तो मचा ही रहा है। हालांकि मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी भी भागवत जी और मोदी जी की तरह इस मामले पर मौन धारण किए हुए हैं।
जानकार बताते हैं कि यह स्थिति साँप छंछूदर जैसी है कि बोले भी तो आखिर क्या बोलें? दान/ चढ़ावे पर नजर रखने वालों के पक्ष में बोलें तो जनता उन्हें भी कहीं चोरी में हिस्सेदार न मान ले। विरोध में बोलें तो अपने ही लोगों के खिलाफ अथवा स्वयं के निर्णय से नियुक्त किए गए ट्रस्टियों के बारे में बोलते ही दामन पर कालिमा का साया मंडराने का भय सताता है।
इसलिए मौन को ही वह हथियार बना लो जो इस समस्या का समाधान बन जाए। हालांकि भाजपा का आईटी सेल चंदा चोरी या गड़बड़ी के मामले में पूरी मुस्तैदी के साथ मोर्चा सम्भाले हुए है। यह भी बिंदु विचारणीय है सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर उनके डिफेंडिंग पोस्ट पर अब विरोधी टिप्पणियों का सामना करना पड़ रहा है जो पहले नजर नहीं आया करता था।
परन्तु अगर जनता के मन में यह चंदा चोरी प्रकरण घर कर गया तो पहले उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव और बाद में देश के लोकसभा चुनाव में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

इसी के मद्देनजर अब ट्रस्ट के महासचिव चंपतराय के करीबी रहे आरोपी टिन्नू यादव व अन्य आरोपियों को सपा नेता और उप्र के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का एजेंट साबित करने की कोशिशें सोशल मीडिया पर देखी जा रही हैं। जबकि पहले महासचिव चंपत राय की ईमानदारी के चर्चे सोशल मीडिया में तैर रहे थे। यहाँ यह मतलब कतई नहीं है कि चंपतराय का इतिहास बेइमानी का ही रहा है। वह जैसे भी हैं अपनी जगह हैं। रही बात उनके इन घटनाओं में शामिल होने या नहीं होने की तो एफआईआर में उनका नाम नहीं है। एसआईटी जांच टीम उनसे पूछताछ करेगी या नहीं यह भी जांचकर्ता जाने।
मुद्दे की बात यह है कि देश के प्राण धर्म है और धर्म पर आई आँच को सहन करने का इतिहास भारत की जनता का नहीं रहा है। कहीं इतिहास ने स्वयं को दोहरा दिया तो भाजपा को सत्ता से बेदखल होना पड़ सकता है और तमाम विपक्षी पार्टियां इस मुद्दे को यूपी के विधान सभा चुनाव तथा लोकसभा चुनावों तक जीवित रखने का प्रयास तो जरूर करेंगी। जो राम को लाये थे हम उन्हीं को लाएंगे … वाला नारा कमजोर हो चुका है। भाजपा को दुआ करना चाहिए कि देश में यह नारा बुलंद न हो जाय कि जो राम का चंदा खायेंगे हम उनको सत्ता से दूर भगाएंगे।

लेखक* एमपी मीडिया पॉइंट के संपादक एवं ख्यातिनाम विश्लेषक हैं।

राजेश शर्मा

राजेश शर्मा मप्र से प्रकाशित होने वाले राष्ट्रीय स्तर के हिंदी दैनिक अख़बारों- दैनिक भास्कर नवभारत, नईदुनिया,दैनिक जागरण,पत्रिका,मुंबई से प्रकाशित धर्मयुग, दिनमान के पत्रकार रहे, करीब पांच शीर्ष इलेक्ट्रॉनिक चैनलों में भी बतौर रिपोर्टर के हाथ आजमाए। वर्तमान मे 'एमपी मीडिया पॉइंट' वेब मीडिया एवं यूट्यूब चैनल के प्रधान संपादक पद पर कार्यरत हैं। आप इतिहासकार भी है। श्री शर्मा द्वारा लिखित "पूर्वकालिक इछावर की परिक्रमा" इतिहास एवं शोध पर आधारित है। जो सीहोर जिले के संदर्भ में प्रकाशित पहली एवं बेहद लोकप्रिय एकमात्र पुस्तक में शुमार हैं। बीएससी(गणित) एवं एमए(राजनीति शास्त्र) मे स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के पश्चात आध्यात्म की ओर रुख किए हुए है। उनके त्वरित टिप्पणियों,समसामयिक लेखों,व्यंगों एवं सम्पादकीय को काफी सराहा जाता है। सामाजिक विसंगतियों, राजनीति में धर्म का प्रवेश,वंशवाद की राजसी राजनिति जैसे स्तम्भों को पाठक काफी दिलचस्पी से पढतें है। जबकि राजेश शर्मा खुद अपने परिचय में लिखते हैं कि "मै एक सतत् विद्यार्थी हूं" और अभी तो हम चलना सीख रहे है..... शैलेश तिवारी

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