49 वर्ष पहले मांगी 400 रुपये घूस, अब बुढ़ापे में जेल जाएगा रिश्वतखोर लेखपाल! कोर्ट ने कहा- 4 हफ्ते में सरेंडर करो
न्यायपालिका

49 वर्ष पहले मांगी 400 रुपये घूस, अब बुढ़ापे में जेल जाएगा रिश्वतखोर लेखपाल! कोर्ट ने कहा- 4 हफ्ते में सरेंडर करो
प्रयागराज, 08 जुलाई 2026
मीडिया रिपोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 41 साल पुरानी एक आपराधिक अपील खारिज कर दी और कंसोलिडेशन लेखपाल को सन 1985 में दी गई सजा बरकरार रखी। लेखपाल को 49 साल पहले सन् 1977 में 300 रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया था।
इस मामले में उसे एक साल के कठोर कारावास की सजा दी गई थी। उच्च न्यायालय के जस्टिस संजीव कुमार की बेंच ने उसकी सजा को बरकरार रखा। दोषी को अपनी बाकी सजा काटने के लिए चार सप्ताह के अंदर ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया गया है।
इस मामले में हाईकोर्ट ने साफ किया कि अगर विजिलेंस अधिकारियों और स्वतंत्र गवाहों से ट्रैप की कार्रवाई की पूरी पुष्टि होती है तो मुख्य शिकायतकर्ता से पूछताछ न करना भ्रष्टाचार के मामले को कमजोर नहीं करता है।
ट्रायल कोर्ट ने 1985 में दी थी सजा
अपीलकर्ता महेश चंद कानपुर की तहसील में कंसोलिडेशन विभाग में लेखपाल के पद पर तैनात थे। उन्होंने कानपुर के 5वें एडिशनल सेशन जज द्वारा सन 1985 में दी गई सजा के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील की थी। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें आईपीसी की धारा 161 और प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट, 1947 की धारा 5(2) के तहत दोषी पाया था।
सन् 1977 के केस में एक ग्रामीण वीरेंद्र सिंह का उसी गांव की एक महिला के साथ कानूनी विवाद चल रहा था। कंसोलिडेशन की कार्रवाई के दौरान कंसोलिडेशन आफिसर ने दोनों को अलग-अलग ‘चक’ (जमीन के टुकड़े) आवंटित किए थे। इसी मामले पर एक अपील सेटलमेंट ऑफिसर (कंसोलिडेशन) के पास लंबित थी।
400 रुपये की रिश्वत मांगी थी
एक अप्रैल 1977 की सुबह लेखपाल महेश चंद और कानूनगो चंद्र सेन उसी बस में सवार हुए जिसमें वीरेंद्र सिंह थे। उन्होंने दूसरी पार्टी की अपील खारिज करवाने का वादा करते हुए 400 रुपये की रिश्वत मांगी। सिंह ने मौके पर ही कानूनगो को 100 रुपये दे दिए। बाद में सिंह कानपुर में अपने बेटे से मिले। दोनों ने मिलकर कानपुर में विजिलेंस एसपी से मुलाकात की और औपचारिक शिकायत दर्ज कराई।