विशेष संपादकीय : जेन जी की गैर मर्यादित भाषा निंदनीय , जेन एक्स की चिंता
शैलेश तिवारी की कलम से

जेन जी की गैर मर्यादित भाषा निंदनीय , जेन एक्स की चिंता
शैलेश तिवारी , सीहोर(मप्र)
जेन जी….. यानि 1997 से 2013 के मध्य जन्मी वह पीढ़ी जिसने आँख खोलते ही या होश में आते ही भाजपा को केंद्रीय सिंहासन पर आसीन देखा। उसी पीढ़ी ने कॉकरोच बनकर मोदी के जादुई तिलिस्म का बंटाढार कर दिया …. जिस सरकार में कभी किसी मंत्री का इस्तीफा नहीं होने की बात कहने वाले केंद्रीय मंत्री को झूठा साबित कर दिया और अपनी मांग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के रूप में पूरा करवा लिया।
यह बात कहने सुनने में राजनैतिक परिवर्तन के संकेत वाली अवश्य लगती हैं लेकिन जेन जी के इस आंदोलन में इस पीढ़ी के द्वारा जिन नारों को गढ़ा गया। उन नारों में भाषाई मर्यादा ने अपनी सीमाएं लांघ दी। राजनैतिक विरोध प्रदर्शनों में या जन आंदोलनों में इस तरह की भाषा का प्रयोग पहले कभी नहीं हुआ। बहुत से जेन एक्स पीढ़ी के लोगों को यह नागवार गुजरा और गुजरना भी चाहिए। जिन शब्दों का इस्तेमाल वहां किया गया, वह नारों के रूप में हो या जेन जी के हाथों में थामी है तख्तियों पर उल्लेखित हों, उनको यहाँ लिखना भी भाषाई मर्यादा का चीर हरण ही कहा जाएगा।
कोई कह रहा है मां बाप ने कैसे संस्कार दिए तो किसी का तर्क यह भी है कि बुढ़ापे में इनके मां बाप इनकी सेवा पाने को तरसेंगे। किसी ने यह भी चिंता व्यक्त की है कि बच्चों में महत्वाकांक्षा जगाने की बजाए उसमें भाषाई संस्कार विकसित किए जाने आवश्यक हैं। इस तरह के अनेकानेक तर्कों, बातों और चिंताओं से सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म भरे पड़े हैं।
मुद्दे की बात यह भी है कि इस जेन जी नाम की क्रांतिकारी पीढ़ी ने इस तरह का शब्द कोश कैसे विकसित किया और इसमें देह आकर्षण जैसी नैसर्गिकता का अभाव भी इस आंदोलन में साफ नजर आया। यह पाश्चात्य संस्कृति के अंश भारतीय वंश के अंश में कैसे स्थापित हुए? लाख टके के इन सवालों का उत्तर खोजने पर जो आश्चर्यजनक तथ्य सामने आए। उन तथ्यों को जानकारों के सिर को 360 डिग्री तक घुमा डाला और उनके चिंतन के मंथन का नवनीत पुरानी कहावतों के रूप में उभर कर हाथ में आ गया। जैसे, जैसी संगत वैसी रंगत, जैसा पानी वैसी वाणी, जैसी नजर वैसा नजरिया आदि आदि कहावतें सामने आ खड़ी हुई । यह कहती हुई कि हम शब्द मात्र नहीं है और न ही कुछ शब्दों का समूह..? हम हैं आपके बुजुर्गों का अनुभव… जिसे शब्दों में बांध कर , आपको विरासत में सौंपा था। आपने अनुभवों की उस विरासत को या आज की भाषा में कहें तो भारतीय ज्ञान परम्परा को भुला सा दिया और इस भूल जाने का नतीजा जेन जी के इस आंदोलन में नारों की शक्ल में रिकार्ड हो गया।
यह बदनुमा रिकॉर्ड आखिर बना कैसे…? सवालिया चिंता यहीं से शुरू हुई थी। पहले हम टहलते हैं सोशल मीडिया की उन गलियों में जहाँ से भाषाई संस्कृति पर कुठाराघात होता आ रहा है। जैसे ओटीपी , इंस्ट्राग्राम, रील, शॉर्ट्स, आदि अनेक सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म हैं जहाँ भाषाई मर्यादा वस्त्र हीन होती रही लेकिन इस पर अंकुश लगाने वाली शक्तियां हस्तिनापुर की राजसभा की तरह नजरें झुकाए अपनी मस्ती में मस्त रहीं। यह शक्तियां मां बाप शिक्षक तो नाम मात्र की हैं। असली ताकत है हमारा प्रसारण मंत्रालय जो इसको रेगुलेट करने की असीम शक्तियों से संपन्न है। या कोई अन्य इसी तरह का शासकीय विभाग जिसको यह देखना था कि इन प्लेटफार्म पर जेन जी के सामने क्या परोसा जा रहा है और क्या परोसा जाना चाहिए था। 2015 के आसपास सरकार की शह पर मुफ्त का डाटा लुटाकर जेन जी को इन प्लेटफार्म का आदी बनाने का काम सरकार की पसंदीदा मोबाइल कंपनी कैसे कर पाती।
इन प्लेटफार्म पर विचरती जेन जी पीढ़ी के दिमाग में वह दृश्य और संवाद आसानी से सेट हो गए। यहीं से देह का नैसर्गिक आकर्षण भी बौना होता जा रहा है। जिसकी झलक जंतर मंतर के आंदोलन में देखने को मिली।
इसी दौर में राजनीति में भी एक नए युग का सूत्रपात हुआ। जिसमें विपक्ष को दुश्मन माना जाने लगा और पचास करोड़ की गर्ल फ्रेंड, जर्सी गाय, मुजरा जैसे अमंचीय शब्द मंचों पर शोभा पाने लगे। सोशल मीडिया पर सरकार से सवाल करते या उसके क्रियाकलापों की आलोचना करते ही आईटी सेल के सक्रिय कार्यकर्ता जिस भोपाली भाषा में प्रश्नकर्ता की बखिया उधेड़ते कि उसको पढ़कर दूसरा कोई हिम्मत ही नहीं जुटा पाता। जो ऐसी भाषा सुनने के आदी हो गए वह दबी जुबान में ही सही अपनी बात कहते रहे और आईटी सेल उन्हें उसी स्तरहीन भाषा में गरियाता रहा।
इन सबको वह जेन जी पढ़ता रहा, सुनता रहा। यह भी संभव है कि यही जेन जी पहले आईटी सेल के लिए काम कर रहा हो। अब वही जेन जी नीट पेपर लीक के मामले में जब सीजेपी के आव्हान पर जंतर मंतर पर जुड़ा तो वही नारे उछाले, उसी भाषा में गुंजायमान किए, जिस भाषा को वह पढ़ता, लिखता और सुनता आ रहा था।
इन तथ्यों का उल्लेख का यह मतलब कतई न निकाला जाए कि जेन जी ने जो किया वह उचित था अथवा उसका यहां समर्थन किया जा रहा है। जेन का गैर मर्यादित भाषा का उपयोग निंदनीय है लेकिन इस भाषा के उपयोग तक वह पहुंचा कैसे? इस पर जो चिन्तन होना चाहिए वह आपके समक्ष प्रस्तुत किया है। यानि संगत की रंगत का असर आता तो है। जो देखा जाएगा, सुना जाएगा, पढ़ा जाएगा और लिखा जाएगा, वह समय आने पर व्यवहार में झलकेगा ही। यह भी संभव है कि जेन जी के कुछ सदस्यों ने जो कुछ बोला या लिख कर दर्शाया, वह उनके द्वारा देखे गए, सुने गए, पढ़े गए और लिखे गए से ज्यादा स्तरहीन हो। जो कुछ भी देखा, सुना, पढ़ा या लिखा जाता है, वह जस का तस व्यवहार में नहीं उतरता। अपना रूप बदल ही लेता है। शायद यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ हो।



