
मजाक से मुहिम तक
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मनीषा शाह , सीहोर
क्या हो किसी दिन एक बच्चा जिसे पढ़ाई में कुछ खासी दिलचस्पी न हो वह मजाक में बोल दे कि आज तो मैं एक पूरा पाठ याद कर लूंगा। पता चले कि उस बच्चे ने एक पाठ ही नहीं बल्कि किताब का हर पाठ याद कर लिया।
शायद यही हुआ 16 मई 2026 जब अभिजीत दिपके नाम का एक आम सा व्यक्ति जिसने मजाक में कह गए शब्द “कॉकरोच” को “काकरोच जनता पार्टी” में बदल दिया। मजाक में कहा गया शब्द एक मुहिम या एक आंदोलन अब बन गया यह पता भी नहीं चला।
इससे एक बात और समझ पड़ती है कि अगर कोई शब्द बोला गया है वो प्रतिध्वनि बनकर वापस जरूर आता है।
इसे फिजिक्स के द्वारा भी समझ सकते हैं। जब कोई ध्वनि तरंग किसी सतह से टकराती है तो कुछ ध्वनि ऊर्जा सतह द्वारा अवशोषित हो जाती है और कुछ ध्वनि ऊर्जा पून:उसी स्थान पर परिवर्तित होकर लौटती है। ध्वनि की ऊर्जा कितनी मात्रा में अवशोषित होगी या परिवर्तित होकर लौटेगी यह सतह की सामग्री पर निर्भर करता है।
कुछ ऐसी ही प्रतिध्वनि हुई जब देश के मुख्य न्यायाधीश ने
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में एक शब्द कहा “कॉकरोच” ।
यह शब्द उन युवाओं को जिनके पास नौकरी नहीं है, यह जानते हुए कि इसका सबब उनकी मेहनत में कमी नहीं बल्कि सिस्टम फेलियर है।
प्रतिध्वनि स्वरूप कॉकरोच शब्द हर एक युवा की ध्वनि बना जो अंधेरे कमरे में एक रोशनी की तलाश कर रहा था।
दूसरी बात यह मुहिम सफल क्यों और कैसे हुई।
इस मूहिम में चाहे बहुत सी खामियां हो जैसे सलिकेदार भाषा का ना होना। अन्य कमियां भी गिनाई जा सकती है।
जंतर मंतर पर एकत्र युवाओं के लक्ष्य, उनकी ऊर्जा , उनकी क्रिएटिविटी मे कोई कमी नहीं थी। लक्ष्य हमेशा इनका गांधी के इरादों का भारत था। इस पूरे आंदोलन की आत्मा गांधी थे।
Gen-z ने आंदोलन का स्वरूप बदला हो पर आंदोलन पर उसकी आत्मा को नहीं। गांधी की तरह लाठियां खाई, टियर गैस को झेला परंतु जवाब में उत्पात का सहारा नहीं लिया।
बल्कि हर क्रूर क्रिया की दृढ़ निश्चय के रूप में प्रतिक्रिया दी।
परिणाम स्वरुप हमने देखा कि देश के शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। यह आंदोलन हमें कई सीख देता है।
जैसे समय के बदलते स्वरूप को देखते हुए स्वयं को भी बदलना चाहिए।
यह बात नेताओं को भी समझनी होगी कि आप हमेशा मंदिर- मस्जिद के नाम पर राजनीति नहीं चला सकते।
दूसरी सीख मिलती है की दृढ़ निश्चय अगर एक संकल्प के लिए हो रहा है और उसका व्यापक तौर पर प्रभाव आ रहा है तो वह संकल्प ईश्वरीय संकल्प बन जाता है। उसे पूरा होने से कोई रोक नहीं सकता।
तीसरा , संकल्प यदि व्यापक है तो वस्तु के कोई मायने नहीं रह जाते चाहे वह भाषा ही क्यों ना हो।
आखिर में कवि गोपाल दास नीरज की
कविता की पंक्तियों के साथ आपको सोचने के लिए छोड़ देती हूं कि आपने इस आंदोलन से क्या सीख ली
पग में गति आती है, छाले छिलने से
तुम पग-पग पर जलती चट्टान धरो।
मैं तूफ़ानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो।
मनीषा शाह सीहोर (मप्र)

