बैरसिया विधायक पर उठे सवाल: कार्रवाई क्यों नहीं?- 500 टन गेहूँ जब्ती मामले में विधायक विष्णु खत्री पर उठे जवाबदेही के सवाल
लेख

बैरसिया विधायक पर उठे सवाल: कार्रवाई क्यों नहीं?
500 टन गेहूँ जब्ती मामले में विधायक विष्णु खत्री पर उठे जवाबदेही के सवाल
किसानों के अधिकार पर सत्ता की चुप्पी
आरोपों के घेरे में विधायक खत्री, क्या पार्टी और प्रशासन साधे हुए हैं चुप्पी?

विजया पाठक, भोपाल
एडिटर, जगत विजन
मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर बहस तेज हो गई है। विष्णु खत्री, जो कि बैरसिया से विधायक हैं, इन दिनों कथित रूप से एक विवाद के केंद्र में हैं। आरोप यह हैं कि उन्होंने किसानों से जुड़े एक मामले में ऐसी कार्रवाई की, जिसने अन्नदाताओं के अधिकारों को प्रभावित किया। इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि आरोप इतने गंभीर हैं, तो अब तक न तो कोई स्पष्ट कानूनी कार्रवाई हुई और न ही पार्टी स्तर पर कोई ठोस कदम दिखाई दिया। स्थानीय स्तर पर सामने आई चर्चाओं और कुछ सामाजिक-राजनीतिक समूहों द्वारा लगाए गए आरोपों के अनुसार, विधायक विष्णु खत्री पर यह आरोप है कि उन्होंने लगभग 500 टन से अधिक गेहूँ जब्त किया। जिसकी कीमत दो करोड़ से अधिक आंकी गई है। आरोप लगाने वालों का कहना है कि यह कार्रवाई उन किसानों के हितों के खिलाफ थी, जिनकी उपज पर उनका वैध अधिकार था। इस घटनाक्रम को “अन्नदाता के अधिकारों पर हस्तक्षेप” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि या आधिकारिक जांच की स्थिति सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है।
अन्नदाताओं के गुनहगार विष्णु खत्री
प्रदेश की मोहन सरकार ने 2026 को किसान कल्याण वर्ष घोषित किया है। इसका मतलब है कि पूरे वर्ष सरकार किसानों के हितों में फैसला लेगी और उनके कल्याण की योजनाएं बनायेगी तथा उनपर अमल करेगी। वहीं उनके ही पार्टी के एक विधायक विष्णु खत्री किसानों के हकों पर डाका डाल रहे हैं। किसानों की उपज के हिस्से पर कब्जा कर लिया है। हजारों किसानों की आय पर डाका डाला है। अपने आप को किसानों का हितैषी बताने वाले खत्री को कम से कम किसानों को तो छोड़ देना चाहिए था। इसके साथ ही प्रदेश की सत्ता और संगठन को भी ऐसे किसान विरोधी विधायक के खिलाफ सख्त कार्यवाही करते हुए एक मिसाल पेश करनी चाहिए।
किसानों के अधिकार बनाम प्रशासनिक कार्रवाई
कृषि प्रधान राज्य जैसे मध्य प्रदेश में किसानों के अधिकार हमेशा संवेदनशील मुद्दा रहे हैं। ऐसे में यदि किसी जनप्रतिनिधि पर किसानों की उपज को लेकर विवाद खड़ा होता है, तो यह स्वाभाविक रूप से राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बन जाता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कई बार प्रशासनिक या कानूनी प्रक्रिया के तहत भी अनाज जब्ती जैसी कार्रवाई होती है जैसे समर्थन मूल्य, भंडारण नियम या अवैध व्यापार की रोकथाम के मामलों में। लेकिन यदि ऐसी कार्रवाई में पारदर्शिता न हो, तो सवाल उठना तय है।
पार्टी की चुप्पी पर सवाल
इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू है पार्टी की प्रतिक्रिया। आरोपों के बावजूद अभी तक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ओर से कोई स्पष्ट सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया है, कम से कम व्यापक स्तर पर। विपक्षी दल और कुछ सामाजिक संगठन यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या पार्टी अपने ही नेता के मामले में नरम रुख अपना रही है। उनका कहना है कि यदि यही आरोप किसी विपक्षी नेता पर होते, तो प्रतिक्रिया अलग हो सकती थी। हालांकि, यह भी संभव है कि पार्टी आंतरिक स्तर पर मामले की समीक्षा कर रही हो, जिसकी जानकारी सार्वजनिक न की गई हो। अब तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार, विधायक विष्णु खत्री के खिलाफ किसी ठोस कानूनी कार्रवाई की पुष्टि सार्वजनिक रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से नहीं हुई है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी जनप्रतिनिधि पर कार्रवाई के लिए ठोस साक्ष्य, शिकायत और जांच आवश्यक होती है। केवल आरोपों के आधार पर कार्रवाई करना संभव नहीं होता, लेकिन यदि शिकायत दर्ज होती है, तो जांच एजेंसियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
जनभावनाओं को प्रभावित करते हैं यह विषय
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक राजनीतिक विमर्श को भी प्रभावित कर सकता है। मध्य प्रदेश में आगामी चुनावी माहौल को देखते हुए, ऐसे मुद्दे जनभावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं। विपक्ष के लिए यह एक अवसर बन सकता है, जहां वह सरकार और सत्ताधारी दल की जवाबदेही पर सवाल उठा सके। वहीं, सत्ताधारी पक्ष के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह पारदर्शिता बनाए रखे और यदि जरूरत हो तो स्थिति स्पष्ट करे।
सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है जनता की अपेक्षा। किसान, जो राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं, वे यह चाहते हैं कि उनके अधिकारों की रक्षा हो और किसी भी प्रकार की कार्रवाई निष्पक्ष व पारदर्शी हो। यदि कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो जनता यह भी अपेक्षा करती है कि संबंधित पक्ष चाहे वह प्रशासन हो या राजनीतिक दल स्पष्ट और जिम्मेदार प्रतिक्रिया दें। विधायक विष्णु खत्री से जुड़े इस कथित प्रकरण ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं क्या वास्तव में किसानों के अधिकारों का हनन हुआ? क्या यह प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा था? और सबसे अहम, यदि आरोप गंभीर हैं तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? इन सवालों के जवाब अभी स्पष्ट नहीं हैं। जब तक आधिकारिक जांच या ठोस तथ्य सामने नहीं आते, तब तक यह मामला आरोपों और प्रतिक्रियाओं के बीच ही बना रहेगा। लेकिन इतना तय है कि इस तरह के मुद्दे लोकतंत्र में जवाबदेही और पारदर्शिता की आवश्यकता को एक बार फिर रेखांकित करते हैं।



