मध्यप्रदेश

ट्रेंडिंग शब्द “दो कौड़ी का” लेकिन “कौड़ी” नहीं महत्वहीन

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त्वरित विचार
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ट्रेंडिंग शब्द “दो कौड़ी का” लेकिन “कौड़ी” नहीं महत्वहीन

जयंत शाह, सीहोर

आजकल एक शब्द काफी ट्रेंड कर रहा है, लोग अपने विरोधी को , या जिसे नापसंद करते हैं। उसके बारे बोलते हैं “दो कौड़ी का आदमी है”
पिछले दिनों एक टीवी न्यूज़ “एंकरानी” ने यूट्यूब पर पढ़ाने वाले शिक्षाविद् के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा कि “उन्हें दो कौड़ी का ज्ञान नहीं है”।

इसी प्रकार से दूसरी घटना में प्रदेश के मुख्यमंत्री ने विपक्षी दल के अध्यक्ष को “दो कौड़ी का” बता कर संबोधित किया। फिर कौड़ी, कौड़ी नहीं रही एक उम्दा ‘कोरस’ बन गई..

मैंने बचपन में अपने पिताजी से और बुजुर्गों से “कौड़ी” का महत्व समझा है। मैंने कौड़ी को मुद्रा के रूप में चलते हुए तो नहीं देखा परंतु दीपावली जैसे महत्वपूर्ण त्योहार पर लक्ष्मी पूजन के दिन कौड़ियों की पूजा करते हुए बुजुर्गों को देखा है।

दरअसल कोडी मुद्रा की एक छोटी इकाई , परंतु मजबूत इकाई हुआ करती थी। जिस प्रकार हम कहते हैं बूंद-बूंद से घड़ा भरता है। इस प्रकार पुराने जमाने में एक-एक कौड़ी जमा करके बड़ी धनराशि एकत्रित की जाती थी।

जो लोग जीवन में बचत का महत्व समझते हैं वे आज भी छोटी से छोटी वस्तु को संभाल कर रखते हैं। कौड़ी एक मजबूत मुद्रा है।इसका सबसे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि कौड़ी के स्थान पर जब धातु के सिक्के चले तो कौड़ी का अस्तित्व समाप्त नहीं हो गया बल्कि उसके साथ-साथ चलता रहा। 16 कौड़ियों का एक पैसा होता था।बुजुर्ग लोग बताते हैं कि एक पैसे में तो थैला भर के सामान आ जाता था।

कौड़ियों की कुछ विशेषताएं...

ये नष्ट नहीं होती।गिनने में आसानी रहती है। कोई नकली कौड़ी नहीं बना सकता। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के ज़माने में भारत में हर वर्ष चालीस हजार पौंड के मूल्य की कौड़ियों का आयात किया जाता था।

आज भारत में कौड़ियों का चलन नहीं रहा लेकिन आज भी वह समृद्धि एवं लक्ष्मी का प्रतीक बन कर लोगों के ह्रदय में प्रतिष्ठित है।जब-जब लक्ष्मी की पूजा होती है,कौड़ी सामने अवश्य होती है‌।

वाराणसी में है कोड़ी माता का मंदिर

उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी में एक मंदिर ऐसा भी है जहां प्रसाद के रूप में कौड़ी चढती है और कौड़ी ही मिलती है।
इसे कौड़ी माता का मन्दिर कहा जाता है। यही नहीं कौड़ी माता का स्नान भी कौड़ी से ही कराया जाता है। अगर दर्शनार्थी कौड़ी लेकर आते हैं‌ और चढ़ाते हैं तो बदले में प्रसाद स्वरूप उन्हें एक कौड़ी दी
जाती है।

भारत की सामाजिक और धार्मिक परंपराओं में कोड़ी का महत्व

दशहरा के अवसर पर कन्याएं अपने घर के दरवाजे के पास गोबर से देवी की प्रतिमा बनाती हैं और उसे कौड़ियों से सजाती हैं। गोवर्द्धन पूजा के अवसर पर भी गोबर से गोवर्द्धन की जो मूर्ति बनाई जाती है,उसे भी कौड़ियों से सजाया जाता है। विवाह के अवसर पर भी कौड़ी को महत्वपूर्ण माना जाता है.वर-वधु के कंकण में कौड़ी बांधी जाती है।

प्रमाण हैं कि आदिकाल में भी कौड़ी बेहद मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण थी और लोग इसे सहेज कर रखते थे।विश्व भर में जहाँ-जहाँ भी ऐतिहासिक खुदाइयां हुई हैं,वहां कौड़ी अवश्य मिली हैं। फिर मनुष्य की जुबां पर चढ़ी है। समय के साथ शब्दार्थ बदलने वालों के लिए कौड़ी का असली महत्व भी तो जानना जरुरी है।
(लेखक एमपी मीडिया पॉइंट के स्थानीय ‘संपादक’ हैं)

राजेश शर्मा

राजेश शर्मा मप्र से प्रकाशित होने वाले राष्ट्रीय स्तर के हिंदी दैनिक अख़बारों- दैनिक भास्कर नवभारत, नईदुनिया,दैनिक जागरण,पत्रिका,मुंबई से प्रकाशित धर्मयुग, दिनमान के पत्रकार रहे, करीब पांच शीर्ष इलेक्ट्रॉनिक चैनलों में भी बतौर रिपोर्टर के हाथ आजमाए। वर्तमान मे 'एमपी मीडिया पॉइंट' वेब मीडिया एवं यूट्यूब चैनल के प्रधान संपादक पद पर कार्यरत हैं। आप इतिहासकार भी है। श्री शर्मा द्वारा लिखित "पूर्वकालिक इछावर की परिक्रमा" इतिहास एवं शोध पर आधारित है। जो सीहोर जिले के संदर्भ में प्रकाशित पहली एवं बेहद लोकप्रिय एकमात्र पुस्तक में शुमार हैं। बीएससी(गणित) एवं एमए(राजनीति शास्त्र) मे स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के पश्चात आध्यात्म की ओर रुख किए हुए है। उनके त्वरित टिप्पणियों,समसामयिक लेखों,व्यंगों एवं सम्पादकीय को काफी सराहा जाता है। सामाजिक विसंगतियों, राजनीति में धर्म का प्रवेश,वंशवाद की राजसी राजनिति जैसे स्तम्भों को पाठक काफी दिलचस्पी से पढतें है। जबकि राजेश शर्मा खुद अपने परिचय में लिखते हैं कि "मै एक सतत् विद्यार्थी हूं" और अभी तो हम चलना सीख रहे है..... शैलेश तिवारी

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