
विशेष संपादकीय
लापरवाही की हीरक जयंती
जिले के किसान भुगत रहे नतीजा
शैलेश तिवारी
बीते 75 सालों से ज्यादा समय से प्रशासनिक रूप से ऐसी लापरवाही बरती गई कि जिले के किसान उसका खामियाजा भुगत रहे हैं। गौर तलब बात यह है कि यह खामियाजा आपसी रंजिश तक में बदल रहा है और कानून व्यवस्था को भी भंग कर रहा है।
कहने को लोकतांत्रिक राज्य में कानून का शासन होता है लेकिन कानून का पालन कराने वाले स्वयं कानूनी प्रावधानों का पालन नहीं कर रहे हैं। जिसके कारण जिले भर के किसान न केवल परेशान हो रहे हैं बल्कि आपसी विवादों में उलझकर फौजदारी तक कर बैठते हैं ।
बात है भू राजस्व संहिता 1959 के प्रावधानों की और इससे पहले प्रचलित रहे भूमि सम्बंधी कानूनों की…. बादशाह अकबर के नौ रत्नों में शुमार रहे राजा टोडरमल ने जमीन को नापने के लिए जो पैमाना बनाया … वह जरीब के नाम से कुछ समय पहले तक प्रचलन में बरकरार रहा और जमीन के लेन देन से लेकर बंटवारे तक में अपने अधिकृत पैमाने की वजह से भू स्वामियों में स्वीकृति पाता रहा।
वक्त ने कुछ ऐसी करवट ली कि जमाना डिजिटल युग में प्रवेश कर गया और युग के प्रभाव से जमीन के नापने की प्रक्रिया भी डिजिटल हो गई।
अब कृषि, व्यवसायिक या आवासीय जमीनें आधुनिक डिजिटल तकनीक से नापी जाने लगी। किसानों की परेशानी का सबब यही डिजिटल पैमाना बना। जिसकी नाप जोख ऐसी हुई कि हर जमीन का नक्शा पड़ोसी की जमीन में निकलने लगा। नतीजा यह हुआ कि जो अच्छे और सच्चे मित्र वत पड़ोसी किसान थे वह भी आपस में दुश्मन हो गए। उनके बीच की यह दीवानी लड़ाई कब आपसी जानलेवा रंजिश में बदल गई, इससे कोई भी बाखबर न रहा।
विगत दिवस जिले के खामलिया और नरेला गांव के किसानों ने उक्त संबंध में कलेक्टर को ज्ञापन सौंप कर इस समस्या की तरफ सभी का ध्यान आकृष्ट किया।
जब हमारी टीम ने इस समस्या के कारणों की खोज की तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
पहले तथ्य का उल्लेख ऊपर किया जा चुका है कि जरीब और डिजिटल नपती के अंतर की वजह से किसानों के बीच यह समस्या सामने आई है।
दोनों प्रक्रिया से जमीन नापे जाने की कार्यवाही में एक प्रमुख अंतर जानकार यह बताते हैं कि दोनों की पैमाइश का जो स्केल है उसमें अंतर होने के कारण यह समस्या ज्यादा सामनें आ रही है। यह प्रशासनिक जांच का विषय है कि इसकी सत्यता का पता लगाया जाए।
दूसरा सबसे प्रमुख कारण है भूमि का यथा समय बंदोबस्त नहीं किया जाना अर्थात सेटलमेंट नहीं होना। इस काम के लिए पहले बंदोबस्त अधिकारी होता था जो बाद में जिला सर्वेक्षण अधिकारी के रूप में जाना जाने लगा। वर्तमान में यह पद भी जिले में नहीं है और जिला कलेक्टर के पास यह अधिकार है। जिला कलेक्टर भी कार्य विभाजन के समय इस काम को किसी अपर कलेक्टर को सौंप देते रहे हैं।
राजस्व कार्यवाही के जानकारों की माने तो असली तथ्य यह है कि जिले में आखिरी बार बंदोबस्त की कार्यवाही 1930 से 1950 के बीच हुई थी।
एमपीएलआरसी 1959 के प्रावधान और अधिनियम 23 सन 2018 एवं अधिनियम क्रमांक 14 सन 2020 के संशोधित प्रावधानों के अनुसार प्रत्येक 30 साल में बंदोबस्त किए जाने का नियम है। जिसका पालन जिले में लगभग 1950 के बाद किया ही नहीं गया है। बंदोबस्त का सामान्य अर्थ है जमीन के नक्शों को काबिज भू स्वामियों के हिसाब से दुरुस्त करना।
जब बीते लगभग 75 सालों से ज्यादा समय से विधिवत बंदोबस्त किया ही नहीं गया तो पहले के लगाये गए मुनारे ( जो जमीन नापने के लिए स्थायी चिन्ह के रूप में इस्तेमाल किए जाते रहे) अपना अस्तित्व खो चुके। जरीब से जमीन नापने का काम भी बंद जैसा हो गया।
अब जो सेटेलाइट नक्शे अपलोड किए गए उन नक्शों की सत्यता को परखा नहीं गया इस कारण भी सीमांकन की प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण हो गई।
जिन गलतियों को पटवारी जरीब की नपती में आसानी से छिपा कर किसानों को विद्वेषता से बचा लेता था अब नक्शे सार्वजनिक होने से वह गलतियां भी सार्वजनिक होकर विवाद का कारण बनने लगी।
इन तथ्यों में एक तथ्य यह भी प्रकाश में आया कि पहले समय की तुलना में वर्तमान में जमीनों की कीमतों ने आस्मान छूना शुरू कर दिया जिसके कारण जो जमीनें बीघा , एकड़ और हेक्टेयर में नापी जाती थी वह अब वर्गफुट में नापी जाने लगी। जिसके कारण तय पैमाना गलत लगने लगा।
इन सभी कारणों में ज्यादा दमदार वजह समय समय पर किए जाने वाले बंदोबस्त का यथा समय नहीं किया जाना है।
इस मामले में राजधानी भोपाल के प्रशासन से सबक लिया जाना ज्यादा सामयिक लगता है । जहां 10 या 12 साल पहले बंदोबस्त किया था इस कारण वहां के किसानों को सीमांकन प्रक्रिया में विवाद का सामना नहीं के बराबर करना पड़ रहा है।



