वैसे इस ‘काण्ड’ में ‘कुछ सवाल’ ‘कुछ’ पुलिस वालों को कुछ ‘पुलिस वालों’ से भी करना चाहिए !
विशेष संपादकीय

वैसे इस ‘काण्ड’ में ‘कुछ सवाल’ ‘कुछ’ पुलिस वालों को कुछ ‘पुलिस वालों’ से भी करना चाहिए !
विशेष संपादकीय
खातेगांव से खोला शराब तस्करों ने बेलगामी का नया खाता, सूबे की आवाम को शासन से माकूल जवाब का इंतजार,
ओर क्या सबूत चाहिए सरकार ?
थाना प्रभारी दिलीप सिंह पुरी की मौत के बाद किस बात का इंतजार…

राजेश शर्मा
मौत से मंहगी शराब, शराब से सस्ता शासन का विभाग, कभी शराब पीने से मौत का अंबार तो कभी शराब तस्करी रोकने से मौत को अंजाम…आखिर यह चल क्या रहा है?
शराब तस्करी की ख़बरें प्रदेश के कई जिलों से लगातार मीडिया में टॉप- 10 में चल रही हैं। रविवार-सोमवार की दरमियानी रात को शराब माफिया का एक अदना सा ‘गुर्गा’ आयशर ट्रक क्रमांक MP47 H 4786 से पुलिस कार्रवाई को ऐसे झटकार गया जैसे यह तो उनके रोजमर्रा के खेल हों। इसे कायरना कृत्य कहें या शराब माफियाओं की बेखोफ-बेलगामी, लेकिन थाना खातेगांव इंदौर-बैतूल हाईवे पर देर रात अवैध शराब की खेप रोकने गए थाना प्रभारी दिलीप पुरी को तस्करों के इस गुर्गे ने अपने वाहन से कुचल दिया। कर्तव्य की वेदी पर एक जांबाज पुलिस अधिकारी की यह शहादत चीख-चीखकर सवाल कर रही है कि आखिर सूबे में कानून का रखवाला ही कितना सुरक्षित है? यह वारदात केवल एक टीआई की हत्या नहीं, बल्कि लोकतंत्र और प्रशासनिक तंत्र को माफिया की तरफ से दी गई सीधी चुनौती है।
यह घटना एक ऐसे समय में हुई है जब राज्य सरकार प्रदेश को व्यसन मुक्त बनाने के लिए बड़े पैमाने पर ‘नशा मुक्ति जनजाग्रति’ अभियान चला रही है। सरकारें मंचों से समाज को नशा मुक्त करने की कसमें खाती हैं, रैलियां निकाली जाती हैं, और जनजागरूकता के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन खातेगांव की यह खूनी हकीकत चीख-चीख कर कह रही है कि जब तक सड़कों पर दौड़ते अवैध शराब के इन ट्रकों और उन्हें संरक्षण देने वाले सिंडिकेट का खात्मा नहीं होगा, तब तक ऐसे जागरूकता अभियान महज कागजी औपचारिकता बनकर रह जाएंगे। एक तरफ जनता को नशे से दूर रहने का संदेश दिया जा रहा है, और दूसरी तरफ नशे के सौदागर इतने बेखौफ हो चुके हैं कि वे इस अभियान की रक्षा करने वाली खाकी वर्दी को ही सरे राह रौंद रहे हैं।
घटनाक्रम साफ करता है कि शराब माफिया का नेटवर्क कितना संगठित और दुस्साहसी हो चुका है। हरदा से गुजरात जा रही अवैध शराब की खेप यह उजागर करती है कि सूबे के हाइवे तस्करों के लिए कितने सुगम बन चुके हैं। सूचना मिलते ही थाना प्रभारी जब पुलिस टीम के साथ नाकेबंदी पर पहुंचे और वाहन चालक को नीचे उतरने को कहा, तब तस्कर ने डरने या सरेंडर करने के बजाय वाहन को आगे बढ़ा दिया और अधिकारी को कुचलते हुए भाग निकला। यह मानसिकता दर्शाती है कि अपराधियों के भीतर कानून का भय समाप्त हो चुका है। वे जानते हैं कि उनके पीछे राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण की कौन सी अभेद्य दीवार खड़ी है।
दुर्घटना पर शोक, मुआवजे की घोषणा, सख्त कार्रवाई की बात सुन सुनकर आम लोगों के कान पक चुके हैं। स्कूली बच्चों की रैली, अभियान, पोस्टर, बैनर, दीवार-लेखन, नुक्कड़ नाटक, रंगोलियों से कुछ फर्क पड़ने वाला होता दो दशकों में अब तक पड़ चुका होता। तस्करों के खून सने हाथों को न्यौता देना बंद करो।
जब तक अवैध धंधों को पर्दे के पीछे से संचालित करने वाले ‘सफेदपोश आकाओं’ पर कड़ा प्रहार नहीं होगा, तब तक मोहरों को पकड़ने से यह नेक्सस नहीं टूटेगा। सत्ता में बैठे नीति-नियंताओं को अब यह समझना होगा कि अपराधियों के खिलाफ केवल मौखिक चेतावनियों या खोखले अभियानों का दौर बीत चुका है। अगर एक थाना प्रभारी को अपनी ड्यूटी निभाते हुए अपनी जान गंवानी पड़ती है, तो पुलिस बल का मनोबल गिरना स्वाभाविक है। आज जरूरत इस बात की है कि ‘नशा मुक्ति जनजाग्रति’ के संकल्प को केवल जनता के उपदेश तक सीमित न रखकर, माफियाओं के समूल नाश का जरिया बनाया जाए। मध्यप्रदेश खासतौर पर मालवा क्षेत्र “शांति का टापू” कहा जाता है, लेकिन जब यहां तस्करों की नशेली ‘तस्तरी’ खून झलकाने वाली , अवैध धंधों को रोकने वाली वर्दी पर ऐसे आत्मघाती हमले कराने वाली साबित होने लगे तो माना जा सकता है कि मालवा की माटी के साथ छलावे के दिन शुरु हो गए हैं। हर ऐसे हादसे के बाद जनता सरकार से सवाल करती है लेकिन इस ‘काण्ड’ में ‘कुछ सवाल’ ‘कुछ पुलिस वालों’ को ‘कुछ पुलिस’ वालों से भी करना चाहिए।



