मप्र : भाजपा की अंतर्कलह सीहोर के कोसमी ‘बीट’ सिंहपुर में उजागर ! क्या असर पड़ेगा पार्टी की पकड़ पर ?
...प्रतिष्ठा की लड़ाई में तब्दील होता पीड़ित आदिवासियों का 'धरना'

भाजपा की अंतर्कलह कोसमी ‘बीट’ सिंहपुर में उजागर ! क्या असर पड़ेगा पार्टी की पकड़ पर ? वोट बैंक बचाने शिवराज सिंह चौहान हुए थे भावुक या भ्रमवश ‘रस्सी’ को समझ बैठे थे ‘सांप’..!

राजेश शर्मा
सबसे पहले तो यह बताना उचित होगा कि सीहोर जिला मुख्यालय से चलकर इछावर होते हुए कोसमी गांव पर खत्म होता है हाइवे का ठेका। फिर शुरु होता है ‘सिंहपुर का अफसाना’ यह गांव पूर्णतः आदिवासी गांवों मे से एक है और इस गांव सहित इससे सटे अन्य गांव भी भाजपा नेताओं से पटे पड़े हैं। ‘कोसमी’ बीट, सिंहपुर गांव जिला सीहोर,तहसील भैरुंदा, विधानसभा बुधनी एवं लोकसभा क्षेत्र विदिशा के अंतर्गत आता है।
बात करें राजनीतिक नेताओं की… तो सीहोर जिला,बुधनी विधानसभा और विदिशा लोकसभा क्षेत्र पर पूर्व मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का पिछले दो दशकों से पूरी तरह वर्चस्व कायम है। सीधे-सीधे कह सकते हैं कि उनके नाम का इन क्षेत्रों में डंका बजता है। चुनावों में चाहे कोई जीते-कोई हारे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
अब यह बताना भी जरुरी है कि शिवराज सिंह ने अपना वर्चस्व स्थापित करने में कोई दादागिरी नहीं की और ना ही गुंडे पाले। उन्होंने जनता से सीधे संवाद के बल पर अपनी इस छवि/इमारत को खड़ा किया।
गत 11अक्टूबर को दर्जन भर आदिवासियों के वन भूमि से कब्जे-अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई वन विकास निगम द्वारा की गई। इस कार्रवाई के विरोध में आदिवासी परिवार सामने आया वहां मौजूद ‘नेता’ ने फोन खटखटाया, अवगत शिवराज सिंह ने काफिला आगे बड़ाया आनन-फानन में पहुंच गए सिंहपुर, उजड़े आशियाने बिलखते बच्चों का दर्द और वोट बैंक की नजर ने बेहद परिपक्व नेता शिवराज सिंह से चंद मिनटों में वो सब कहलवा लिया जिसकी उम्मीद शायद कांग्रेस को भी नहीं थी। खुद की और भाजपा की जीत को ‘इन्हीं'(आदिवासियों) की देन बता डाला। इस बात पर मंथन जारी है कि मौके पर शिवराज सिंह इतने भावुक क्यों हुए! ऐसा तो नहीं कि हड़बड़ाहट में वे भ्रमवश ‘रस्सी’ को ‘सांप’ समझ बैठे!!
बस यहीं से शुरुआत होती है उस सियासत की जो अब तक बेजुबां थी। भाजपा के अंदर दबी थी। मीडिया को केवल ‘कयास’ के अलावा दूसरा मौका नहीं दे रही थी। लेकिन अब सबकुछ उजागर हो गया लगता है सत्तारुढ़ दल दो धड़ में बंट गया ! मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने कम शब्दों बहुत कुछ कहा। फटाफट मामले की जांच रिपोर्ट सीहोर कलेक्टर की तरफ से आ गई। जिसमें स्पष्ट कहा गया कि सन् 2022 में कि 78,700 पौधे सागौन के काटकर 31.48 हेक्टेयर वन भूमि पर कब्जा किया गया था। 11 अक्टूबर को ताजा मामले में सभी 09 कब्जाधारी व्यक्तियों के सिंहपुर और हबीबनगर में पहले से ही पक्के मकान, मकान नम्बर, वोटर आइडी कार्ड दर्ज हैं। उधर भैरुंदा तहसील कार्यालय के राजस्व रिकॉर्ड में भी जांच के दौरान सामने आया कि अपने आपको भूमिहीन बताने वाले इन लोगों के पक्के मकान भी खुद के मूल गांव में बने हुए हैं।
हकीकत को बयां करती यह जांच रिपोर्ट उस वक्त सामने आई जब कार्रवाई के विरोध स्वरुप सिंहपुर में ‘वो’ ही ‘धरना’ अब तक जारी है जिसमें शिवराज सिंह चौहान एवं उनके पुत्र ‘प्रदेश व्हालीबाल संघ’ अध्यक्ष,कार्तिकेय चौहान बैठकर जा चुके हैं।
अब सवाल यह उठता है कि भाजपा में ‘कोसमी बीट’ से शुरु हुई ‘महाभारत’ कितनी आगे बढ़ेगी ? भाजपा के प्रादेशिक नेताओं के लिए भी अपनी-अपनी निष्ठाएं निर्धारित करने का पैचिदा वक्त सामने आ सकता है! दिल्ली का ‘दिल’ जिस पक्ष पर नहीं बोला समझा जा सकता है की उसका सिंहासन डोला…
फैसला जो भी हो लेकिन सीहोर जिले का सिंहपुर गांव सुर्खियां बटौर रहा है। नादान घाट के नीचे की ‘वनभूमि’ राजनीति की ‘रणभूमि’ बन चुकी है। भाजपा की अंतर्कलाह उजागर करती इस स्टोरी का क्लाइमेक्स अभी कायम है, क्योंकि कांग्रेस का इसमें प्रदेश स्तर पर प्रवेश किस रोल में और किस छोर से होगा ये बेहद मायने रखता है। फिलहाल कांग्रेस ने धरना स्थल पर पहुंच कर बुधवार को जिला लेबल पर पीड़ित परिवार के साथ खड़े रहने की बात कही है। जो अभी पासंग में भी नहीं है।



