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चोरी, लूट, डकैती या गबन…, है तो आस्था, श्रद्धा व विश्वास का मर्दन

विशेष विचार

चोरी, लूट, डकैती या गबन…. है तो आस्था, श्रद्धा व विश्वास का मर्दन

– शैलेश तिवारी
राम मंदिर…. नाम ख्याल में आते ही मन अयोध्या पहुंच जाता है। जहां रामलला विराजमान हुए। बीती सदी के अस्सी के दशक में शुरू हुआ आंदोलन …. आजाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा आंदोलन… जिसमें भारत भूमि की रज रज का कण कण पौने तीन लाख राम शिला बनकर अयोध्या पहुंचा…. यहां के जन जन के मन मन में बसे राम …. मुखर होकर जय श्री राम का नारा बन गए। आंदोलित जन और उसके मन ने राम शिलाओं के साथ ही विहिप के आधिकारिक बयान अनुसार 8.29 करोड़ रूपये की दान राशि भी मंदिर निर्माण के लिए पहुंचाई। हालांकि कुछ आलोचक और विपक्षी देश विदेश से एकत्रित राशि को 1400 करोड़ रूपये बताते हैं जिसे विहिप द्वारा मिथ्या और भ्रामक बताया जाता रहा।
पहले 20 वीं सदी के अंत में और बाद में 21 वीं सदी के 14 वें साल में राम के नाम पर सरकार बनी और एक सुप्रीम आदेश आते ही राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया। उसी आदेश में केंद्र सरकार को राम मंदिर न्यास बनाने का भी आदेश मिला। “श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास” गठन के साथ ही देश भर से मंदिर निर्माण के लिए चंदा उगाही की गई ।
ट्रस्ट की आधिकारिक बैठकों और वित्तीय रिपोर्टों के अनुसार, न्यास गठन के बाद से कुल 4,575 करोड़ रुपये से अधिक की राशि (चंदा और अन्य प्राप्तियां) एकत्रित हो चुकी है।
वर्तमान में राम मंदिर को विभिन्न माध्यमों (हुंडी/दानपात्र, ऑनलाइन और काउंटर्स) से हर महीने औसतन करीब 5 करोड़ रुपये का चढ़ावा मिल रहा है। अकेले वित्त वर्ष 2025-26 की बात करें, तो मंदिर की कुल वार्षिक आय 220.81 करोड़ रूपये दर्ज की गई थी।
फिर आती है 7 जून 2026 की वह तारीख , इसी दिन राम मंदिर के चढ़ावे और दान में मिली राशि की चोरी की बात सार्वजनिक होती है। मंदिर न्यास के द्वारा राज्य सरकार से एसआईटी गठित कर जांच की मांग की जाती है। इसी बिंदु पर पहला सवाल मन मस्तिष्क में कौंधता है कि सीधे एसआईटी से जांच की मांग क्यों की गई? प्रथम सूचना रिपोर्ट पुलिस थाने में दर्ज क्यों नहीं करवाई गई?
खैर राज्य सरकार द्वारा एसआईटी के गठन के साथ ही जांच के बिंदु भी तय किये जाते हैं। विभिन्न रिपोर्ट के अनुसार अन्य जांच बिंदुओं सहित प्रमुखतः तीन बिंदु तय होते हैं।
पहला राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान, चढ़ावा आदि में कुल कितनी राशि या सामग्री प्राप्त हुई और उसमें से कितनी राशि की चोरी हो गई।
दूसरा राम मंदिर के निर्माण हेतु कुल कितनी जमीनें खरीदी गई और उनमें कितनी राशि की हेराफेरी या गबन हुआ।
तीसरा राम मंदिर निर्माण के दौरान टेंडर देने या सामग्री क्रय करने अथवा अन्य कारण से किए गए व्यय में कितनी आर्थिक अनियमितताएं या भ्रष्टाचार हुआ।

दान / चंदा चोरी के लिए महज 40 दिन के वीडियो फुटेज खंगाले जाते हैं और 70 बार चोरी का मामला उजागर होता है। इस पर सवाल भी उठते हैं कि 40 दिन से ज्यादा के सीसीटीवी फुटेज क्यों नहीं देखे गए? कहीं से सरसराहट होती है कि बाकी रिकार्डिंग डिलीट हो चुकी है। दान पात्र और चढ़ावे में मिली राशि और सामग्री में चोरी की अनुमानित राशि 200 करोड़ रूपये से 500 करोड़ रूपये तक बताई जा रही है। आश्चर्यजनक तथ्य यह भी खुलासा होता है कि मंदिर में लगे कैमरों की निगरानी करने और दान की राशि गिनने का काम वही लोग करते रहे जिन्हें आरोपी बनाया गया है। पुलिस में दर्ज आठ नामजद आरोपी गिरफ्तार कर लिये गए हैं। सभी मंदिर समिति के ट्रस्टियों के करीबी हैं या रिश्तेदार हैं। यह तथ्य बताते हैं कि सब कुछ सुनियोजित षडयंत्र के दायरे में है।

दूसरे बिंदु की तहकीकात के लिए आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने 2021 में दस्तावेजी सबूत पेश करते हुए मंदिर के लिए की गई जमीन खरीदी में हेराफेरी के आरोप लगाए थे। मौटे तौर पर बताया जाता है कि यह जमीन खरीदी की हेराफेरी लगभग 300 से 600 करोड़ रूपये के आसपास है। उस समय उनकी आवाज को दबा दिया गया । अब उन्होंने वह सारे रिकॉर्ड्स एसआईटी को जांच के लिए फिर से उपलब्ध कराए हैं।
तीसरे बिंदु का खुलासा उस समय हुआ जब एक इंजीनियर ने मंदिर निर्माण के लिए जारी टेंडर्स में 40 प्रतिशत तक की राशि कमीशन के रूप में मांगे जाने की बात कही है। मंदिर निर्माण की अनुमानित लागत 1900 से 2150 करोड़ रूपये की बताई जाती है। अभी तक इस राशि में से 1600 करोड़ रूपये का भुगतान किया जा चुका है। इस हिसाब से 640 करोड़ रूपये तक की राशि कमीशन के रूप में डकारे जाने का संदेह पैदा होता है।

  1. इस हिसाब से मंदिर में प्राप्त राशि में से कम से कम एक हजार करोड़ रूपये की चोरी हो चुकी है । यह मान लिया जाए कि गिरफ्तार किए गए आठों आरोपियों ने 10-10 करोड़ भी चुराये होंगे, जिनमें से काफी कुछ बरामद हो भी चुका है,तो भी बाकी के नौ सौ करोड़ रूपये की भारी भरकम राशि तो यह छुटभैये आरोपी डकार नहीं सकते? यानि कोई और भी इनका सरपरस्त है । जिसके या जिनके पास यह भारी भरकम राशि पहुंची है और उनके नाम अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं। देश भर के राम भक्तों की श्रद्धा , आस्था और विश्वास का मर्दन करने वाले आरोपियों की गर्दन तक कानून के हाथ जल्दी पहुंचे। अभी तो यही उम्मीद जांच दल से की जा रही है।
    चलते चलते उस तर्क का खंडन करना उचित लगता है जिसमें यह कहा जा रहा है कि दान देने के बाद हिसाब क्या पूछना। जो दे दिया तो दे दिया। इस तर्क के पक्ष में अनेकानेक पौराणिक दान कथाओं का उल्लेख कर अपन पक्ष को मजबूत किया जा रहा है। इस बारे में यह कहना ज्यादा उचित रहेगा कि देश , काल और परिस्थितियों के अनुसार दान, धर्म आदि परिभाषाएं परिवर्तनशील हैं। उस समय दिए गए दान की रसीद भी जारी नहीं की जाती थी, न ही प्राप्त दान राशि के ऑडिट किए जाने की व्यवस्था थी और न ही दान के आय व्यय को सार्वजनिक किए जाने की परम्परा रही। अब यह सब किया जाता है ताकि पारदर्शिता बनी रहे। जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाने के लिए यह सब सामाजिक और कानूनी रूप से किए जाने की परम्परा प्रचलित है तो इसमें अगर कुछ हेर फेर हुआ है तो दोषियों को कानूनन सजा मिलना भी चाहिए क्योंकि इस तथ्य से सभी सहमत हैं कि राम मंदिर के नाम पर प्राप्त दान या चढ़ावा राशि में गड़बड़ तो हुई है। जब यह माना जा रहा है तो यह उम्मीद भी पाली जाएगी कि वह गड़बड़ कुल कितने रुपए की है और किसके द्वारा की गई है?

(लेखक – संपादक एवं प्रख्यात विचारक हैं)

राजेश शर्मा

राजेश शर्मा मप्र से प्रकाशित होने वाले राष्ट्रीय स्तर के हिंदी दैनिक अख़बारों- दैनिक भास्कर नवभारत, नईदुनिया,दैनिक जागरण,पत्रिका,मुंबई से प्रकाशित धर्मयुग, दिनमान के पत्रकार रहे, करीब पांच शीर्ष इलेक्ट्रॉनिक चैनलों में भी बतौर रिपोर्टर के हाथ आजमाए। वर्तमान मे 'एमपी मीडिया पॉइंट' वेब मीडिया एवं यूट्यूब चैनल के प्रधान संपादक पद पर कार्यरत हैं। आप इतिहासकार भी है। श्री शर्मा द्वारा लिखित "पूर्वकालिक इछावर की परिक्रमा" इतिहास एवं शोध पर आधारित है। जो सीहोर जिले के संदर्भ में प्रकाशित पहली एवं बेहद लोकप्रिय एकमात्र पुस्तक में शुमार हैं। बीएससी(गणित) एवं एमए(राजनीति शास्त्र) मे स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के पश्चात आध्यात्म की ओर रुख किए हुए है। उनके त्वरित टिप्पणियों,समसामयिक लेखों,व्यंगों एवं सम्पादकीय को काफी सराहा जाता है। सामाजिक विसंगतियों, राजनीति में धर्म का प्रवेश,वंशवाद की राजसी राजनिति जैसे स्तम्भों को पाठक काफी दिलचस्पी से पढतें है। जबकि राजेश शर्मा खुद अपने परिचय में लिखते हैं कि "मै एक सतत् विद्यार्थी हूं" और अभी तो हम चलना सीख रहे है..... शैलेश तिवारी
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