देश भक्ति के जज्बे और जुनून ने अमेरिका से मनवाई शर्तें…. ज्ञान और विज्ञान का संयुक्त मंच तैयार किया ईरान ने….
संपादक की कलम से

- देश भक्ति के जज्बे और जुनून ने अमेरिका से मनवाई शर्तें….
ज्ञान और विज्ञान का संयुक्त मंच तैयार किया ईरान ने….
शैलेश तिवारी
जिंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर… जान देने की रुत रोज आती नहीं… किसी फिल्मी गीत की यह पंक्तियां देश भक्ति का जज्बा जगाने और जुनून पैदा करने का माद्दा रखती हैं , इसमें किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं है। इन पंक्तियों को वास्तविक जीवन में चरितार्थ होते देखना तो शायद किसी पुण्य कर्म का फल ही कहा जा सकता है।
देश के लिए मर मिटने का संकल्प जब किसी देश के नागरिकों में आ जाए और वह भी युद्ध काल के दौरान आए तो फिर उस युद्ध को केवल वहां की सरकार नहीं लड़ रही होती है बल्कि पूरा देश लड़ रहा होता है।
इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हाल ही में ईरान पर इजरायल और अमेरिका के आक्रमण के बाद शुरू हुए युद्ध में देखने को मिला। शुरुआती दौर में इजरायल और अमेरिका की सैन्य शक्ति के मुकाबले ईरान बहुत कमजोर नजर आ रहा था। उस समय लगा भी रहा था कि अमेरिका जैसे महाशक्ति और इजरायल की तकनीकी तथा गुप्तचर चालाकी के सामने ईरान भला कितना ही टिक पाएगी। इसी दौर में सोशल मीडिया पर यह भी प्रचारित हो रहा था कि ईरान एक कट्टरवादी देश है और वहां की जनता ईरान की सत्ता बदलने की बेताब है। ईरान के रिजिम चेंज करने के लिए ही वहां अमेरिका ने इजरायल के कहने पर आक्रमण किया और यह सोचकर कि वहां एक लिबरल सरकार का गठन हो सके जो अमेरिका के इशारों पर चल सके जिससे ईरान के प्राकृतिक संसाधनों पर प्रत्यक्ष रूप से अमेरिका का कब्जा हो जाए और दुनिया में अपनी बादशाहत का विस्तार और ज्यादा कर सके जैसे उसने कुछ ही समय पहले वेनेजुएला के राष्ट्रपति का उनकी पत्नी सहित अपहरण करके साबित किया था और दुनिया में किसी देश ने चूं तक नहीं की।
अमेरिका वैसा ही मामला ईरान का समझकर चल रहा था और आरंभिक दौर की बमबारी के बाद अमेरिका ने यह बयान देना भी शुरू कर दिया कि हमने ईरान को बर्बाद कर दिया है। उनका यह बयान तब ज्यादा विश्वसनीय माना जाने लगा जब अमेरिका के एक हमले में वहां के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खुमनई की अपने कुछ साथियों सहित मौत हो गई। दरअसल अमेरिका इसे अपनी जीत मान रहा था लेकिन उससे और इंटेलिजेंस से यह समझने में भूल हो गई कि ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर अपनी सेकेंड लाइन भी तैयार कर के गए हैं । जो उनके बाद आसानी से सारे सूत्र सम्भाल लेगी और ईरान युद्ध में अमेरिका पर हावी होता चला जाएगा। लगभग ऐसा ही हुआ भी… जब मुज्तबा खुमनई सुप्रीम लीडर चुने गए और उन्होंने युद्ध को अपने पिता से भी बेहतर संचालित करना शुरू कर दिया। अमेरिका और इजरायल की महंगी सैन्य शक्ति को ईरान के सस्ते युद्ध उपकरण मात देने लगे। ईरान के आसपास अमेरिका ने जितने भी देशों में अपने सैनिक अड्डे बनाए थे और वहां अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम स्थापित किया थे । उन सभी अड्डों को ईरान के सस्ते बम वर्षक ड्रोन ने तबाह कर दिया। अमेरिका के सैनिकों को बेस कैंप छोड़कर वहां की होटलों में शरण लेना पड़ी और जलडमरू मध्य यानि स्ट्रेट ऑफ हार्मोज पर ईरान का सीधा नियंत्रण हो गया वहां से निकलने वाले तेल और गैस के जहाज बिना उसकी मर्जी के आवाजाही नहीं कर सकते थे।
यह तो हुई उड़ा कि संक्षिप्त रूपरेखा लेकिन वहां के सुप्रीम लीडर की मौत के बाद ही ईरान के लोगों में देश के लिए कुरबानी देने का जज्बा तेजी से बढ़ गया। स्वर्गीय खुमनई के पास आई गुप्तचर संस्थाओं की सूचना के आधार पर वह किसी बंकर में छिप कर अपनी मौत को टाल सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया बल्कि जानबूझकर स्वयं मृत्यु का वरण कर लिया और उनका यही बलिदान ईरान के नागरिकों के सामने मिसाल बन गया।
जब अमेरिका ने युद्ध के पैंतीस दिन बाद जब यह चेतावनी जारी की कि अब वह ईरान के पुलों, महत्वपूर्ण सड़कों, बिजली घरों और अन्य आम जन जीवन के उपयोगी संस्थानों को अपने आक्रमण में निशाना बनाएगा और इसके लिए उसने एक डेड लाइन भी तय कर दी।
उसकी निर्धारित समय सीमा से पहले ही विदेशों में बसे ईरानी नागरिक वापस अपने देश पर बलिदान होने के लिए ईरान में आने लगे और जो वहीं ईरान में रह रहे थे ऐसे तमाम अलग अलग क्षेत्रों की प्रमुख हस्तियां उन जगहों पर पहुंचने लगे जिसको अमेरिका निशाना बनाने जा रहा था। उन प्रसिद्ध हस्तियों के पीछे वहां की जनता भी लाखों की संख्या में एकत्रित होने लगी सबके हाथ में ईरान का राष्ट्र ध्वज था और नारों से आकाश गूंजने लगा । नारों का भाव अमेरिका विरोधी तो था ही साथ में यह भी कहा जा रहा था कि अमेरिका की मिसाइलें या बम ईरान की धरती को तभी छू पाएंगे जब वह हमारे शरीर के चिथड़े उड़ा देंगे। ईरान के लगभग नौ करोड़ की आड़ा में डेढ़ करोड़ आबादी ने सरकार के पास अपना रजिस्ट्रेशन करा लिया कि वह इस युद्ध में अपनी कुर्बानी देने के लिए तैयार हैं और अमेरिका के लड़ाकों से जमीनी युद्ध में दो दो हाथ करने के लिए सीना ठोक कर खड़े होंगे।
जिसको जैसा काम आता था वह उस काम को अमेरिका से लड़ाई में करने को अपनी जान देने की कीमत चुकाकर करने को कमर कस के तैयार दिखा। गौर तलब बात यह भी है कि इन पंजीयन कराने वालों में वहां के सांसद, नेता, अधिकारी, कर्मचारी, महिलाएं, युवक, बच्चे , वृद्ध सभी तबके के लोग शामिल हैं।
जिस देश के लोगों में अपने देश के लिए इतना समर्पण हो , वह देश किसी भी महाशक्ति को परास्त करने का हौसला रखता है यह ईरान और वहां के लोगों ने सिद्ध कर दिया । इस युद्ध में व्यक्तिगत रूप से एक बात ने मुझे बहुत प्रभावित किया कि ईरान धार्मिक आधार पर एक कट्टरपंथी देश है इसमें कोई दो मत नहीं है। लेकिन वहां के नेतृत्व ने युद्ध की वह सस्ती तकनीक ईजाद की जिसने अमेरिका और इजरायल के अत्याधुनिक युद्ध तकनीक से लैस संसाधनों को नेस्तनाबूत कर दिया जिसमें अमेरिका का वह युद्ध क्षेत्र का तिलस्मी हवाई जहाज एफ 35 भी शामिल है। जिसका इस युद्ध से पहले किसी के पास कोई तोड़ नहीं था। ऐसे विमानों को भी ईरान के सेना द्वारा अपनी सस्ती युद्ध तकनीक के दम पर मात देना उनकी युद्ध की लंबी तैयारी की गवाही देने के लिए काफी है। जानकार इसे बीस सालों की तैयारी मान रहे हैं।
कहने का मतलब इतना है कि धर्म के साथ विज्ञान के गहरे और मजबूत गठजोड़ का अनूठा उदाहरण ईरान ने दुनिया के सामने पेश किया है। इसी के दम पर अमेरिका जैसी महाशक्ति ने ईरान की 10 शर्तों को मान कर युद्ध को दो हफ्तों के लिए मुल्तवी कर दिया है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका की उच्च स्तरीय प्रतिनिधि मंडल की आगामी 10 अप्रैल से शांति वार्ता शुरू होगी। इससे शेष दुनिया ने राहत की सांस ली है।
शैलेश तिवारी , सीहोर




