
जिंदगानी !! बस 7 पड़ाव के किरदारी की कहानी
मनीषा शाह, सीहोर
आज सुबह जब मैं सुकून के लम्हे खुद के साथ बिता रही थी तब यूं ही मेरी नजर एक बड़ी दिलचस्प या एक साधारण व्यक्ति की एक असाधारण खबर पर पड़ी। जिस खबर का शायद इंतजार मेरी कलम कुछ दिन से कर रही थी! क्यों? शायद आप खबर सुनकर समझ जाए! यह कहानी विपिन कुमार की है जो अभी तक महज एक नाम है, पर वह नाम लेखक की कहानी का किरदार तब बनता है, जब वह रोमानिया में अपने दोस्त के साथ काम से निकलता है और उसकी नजर पड़ती है एक 5 वर्षीय बच्ची पर… जो की बर्फ से ढकी नदी में फंसी हुई थी! और विपिन जो करीब डेढ़ साल पहले भारत से रोमानिया आया था और एक कंस्ट्रक्शन वर्कर का काम कर रहा था! वह विपिन बिना दोबारा सोचे एक असाधारण सा निर्णय लेता है, वह एक पास पड़ा हुआ बर्फ तोड़ने वाला हथोड़ा उठा लेता है और बर्फ पर चोट करने लगता है! इन सब कोशिशों में वह खुद भी बर्फीली नदी में गिर जाता है!
अब परेशानी यह थी कि विपिन की जान भी खतरे में है उस 5 वर्ष की बच्ची के साथ! जब आपको पता हो कि अगले कुछ क्षणों में मृत्यु आपका इंतजार कर रही है तो यही एक परीक्षा का वक्त साबित होता है, कि व्यक्ति ईश्वर के दिए इस
कीमती तोहफे की कितनी एहतराम करता है!
अब यही विपिन अगले 30 मिनट तक उसे बच्ची को और खुद को जकड़ कर ऐसे पड़े रहता है जब तक इमरजेंसी रेस्क्यू टीम उन दोनों को सुरक्षित नहीं निकाल ले जाती है! करीब 1 साल बाद रोमानिया सरकार उसके इस जज्बे पर उसे रोमानिया सिटीजनशिप से नवाज़ती है।
अब कहानी का जो सिर्फ एक मामूली किरदार था वह एक गैर मुख्तलिक नायक बनकर उभरता है! इस कहानी को अपने पाठकों तक लाने का मकसद सिर्फ एक कहानी पढ़ाना नहीं, बल्कि अपने जमाने के महान लेखक -कवि विलियम शेक्सपियर द्वारा लिखे मशहूर नाटक All the world’s a stage से जोड़ना है। जिसमें लेखक बता रहा है कि दुनिया रंगमंच है, आदमी और औरत बस अपना किरदार निभा रहे हैं 7 पड़ाव में!
पहला पड़ाव है एक बच्चे का जो रो रहा है नर्स के हाथों में ,दूसरा कवि ने बताया है एक स्कूल जाते लड़के का , तीसरा जब वो किसी मेहबूबा के इश्क़ में मायल है ,चौथा जब वह एक जवान के कपड़ों में दाढ़ी में रोब दिखाता हुआ , पांचवा जब वह एक ४५-५० साल का आदमी है जो अब ज़िन्दगी के फ़साने सुना रहा है ,छठा जिसकी आंखों के चश्मे के नंबर बढ़ चुके है और उसकी चाल लड़खड़ा रही है , सातवां जब उसके सारे दांत टूट चुके हैं , मुँह का स्वाद जा चुका है , आँखों की बिनाई जा चुकी है और बस है ही एक दिन जब वो दुनिया को अलविदा कह देता है !
यह बात बिलकुल सत्य है की हर इंसान की स्क्रिप्ट का प्रोडूसर खुदा है पर यह भी गलत नहीं कि किरदार कैसा निभाना है ये इस आदमी के हाथ में है जैसे विपिन के हाथ में था !
यह किरदार की पसंद पे निर्भर करता है की वो एक नायक बनकर उभारना चाहता है या एक मामूली किरदार बनकर !!
ईश्वर हर एक किरदार को एक मौका तो देता ही है की वो अपनी कहानी का नायक बने !
मिसाल के तौर पर आप यह किस्सा सुनते होंगे की एक बहुत कम आमदनी के परिवार का बच्चा एक बड़ा अफसर बनने के लिए चयनित हो गया . यह कहानी का वो मोड़ या मौका है
जब वो आदमी या तो अपने परिवार और पूरे मआशरे में एक मिसाल बन सकता है या अपनी ही कहानी का विलेन ! पर अक्सर यह देखने को मिलता है वो अपने पेशे के साथ इंसाफ करने की बजाये , या तो घुस लेता पकड़ा जाता है , या मजलूमों को ख्वार करता नज़र आता है , निजी जीवन में दहेज़ जैसे कुप्रथा को पोषित करते हुए , या सबसे नीचतम काम करते हुए !
दूसरी मिसाल है हमारे नेता जिन्हे जब तक सत्ता का स्वाद न लगा होता है तब तक सड़कों पर बैठकर धरने देते नज़र आते हैं, हकों की दुहाई देते नहीं थकते ,मौका मिलते ही हकों को छीनने वाले बन जाते हैं।
सच कहा है किसने आपकी वफ़ादारी का असली परिक्षण तब है जब मौका मिलने पर भी आप तस से मास नहीं हुए , ज्यों के त्यों ही है !
आखिर में कुछ पंक्तियों से विराम देना चाहती हूँ
अगर चारागर नहीं बन सकते तो तमाशबीन भी न बनिए,
अगर नायक नहीं बन सकते तो खलनायक भी न बनिए…
बेहतर है की मौक़िन अदाकार बनिए (सेकंड लीड)
शायद इनाम के तौर पर खुदा दुनियां में उसकी
सुकून इ मकाम ही नवाज़ दे !
लेखिका मनीषा शाह पेशे से इंजीनियर हैं।
