सीहोर

अच्छी ख़बर : एक दुखियारी मां को सीहोर एसडीएम से मिला न्याय, अब पुत्र को देना पड़ेगी प्रतिमाह भरण-पोषण के लिए राशि…

न्याय की कुर्सी का फैसले से श्रंगार..

अच्छी ख़बर : एक दुखियारी मां को सीहोर एसडीएम से मिला न्याय, अब पुत्र को देना पड़ेगी प्रतिमाह भरण-पोषण के लिए राशि…

“कानून के सहारे खड़ी माँ और सवालों के कटघरे में समाज”

सीहोर, 05 फरवरी, 2026
एमपी मीडिया पॉइंट

सीहोर के लुनिया मोहल्ला गंज की बुजुर्ग श्रीमती शांताबाई की कहानी केवल एक खबर नहीं है, बल्कि आज के समय की उस सिसकती संवेदना की दास्तान है, जो धीरे-धीरे हमारे समाज से खोती जा रही है। यह कहानी उस माँ की है, जिसने जीवन भर अपने पुत्र के लिए त्याग किया, पर जीवन के अंतिम पड़ाव पर उसी पुत्र से अपने भरण-पोषण के लिए कानून की शरण लेनी पड़ी।

विधवा और वृद्ध शांताबाई के जीवन में सहारा देने वाला केवल एक ही पुत्र है विनोद। ग्राम गोपालपुरा में स्थित उनकी स्वामित्व की भूमि पर पुत्र फसल बोता है, उससे लाभ अर्जित करता है, पर उसी भूमि की स्वामिनी माँ के जीवन निर्वाह की जिम्मेदारी निभाने से पल्ला झाल लिया। यह दृश्य केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतीक है, जहाँ रिश्ते सुविधा और स्वार्थ के दायरे में सिमटते जा रहे हैं।

जब माँ-बाप की जरूरतें बोझ लगने लगें, तब समझ लेना चाहिए कि संवेदनाएं कहीं गहरे में खो गई हैं। वही माँ, जिसने बिना किसी हिसाब-किताब के अपने बेटे को पाला-पोसा, आज अपने अधिकारों के लिए माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम का सहारा लेने को मजबूर हुई। यह कदम उनके लिए आसान नहीं रहा होगा, लेकिन मजबूरी कभी-कभी आत्मसम्मान से भी बड़ी हो जाती है।
सीहोर एसडीएम तन्मय वर्मा द्वारा इस प्रकरण को गंभीरता और संवेदनशीलता से लेना केवल एक प्रशासनिक कार्यवाही नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना का प्रयास है। सुनवाई के दौरान जब पुत्र अपने पक्ष में कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका, तब एसडीएम तन्मय वर्मा के न्यायालय ने शांताबाई के पक्ष में निर्णय देते हुए प्रतिमाह 1500 रुपये भरण-पोषण राशि उनके बैंक खाते में जमा करने के आदेश दिए। यह राशि भले ही छोटी प्रतीत हो, पर इसके पीछे छिपा संदेश बहुत बड़ा है।

यह घटना हम सभी को ठहरकर सोचने पर मजबूर करती है, कि क्या आधुनिक जीवन की दौड़ में हम अपने सबसे पवित्र रिश्तों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं? माता-पिता हमारे जीवन की नींव हैं, कोई कानूनी दायित्व नहीं जिन्हें मजबूरी में निभाया जाए। उनकी सेवा आदेश से नहीं, संस्कार से होती है, कानून से नहीं बल्कि करुणा से होती है। शांताबाई की व्यथा समाज को चेतावनी देती है कि अगर आज हमने अपने माता-पिता की कद्र नहीं की, तो कल केवल पछतावा ही शेष रहेगा। वे हमारे अतीत हैं, हमारी पहचान हैं और हमारे संस्कारों का जीवंत स्वरूप हैं।

राजेश शर्मा

राजेश शर्मा मप्र से प्रकाशित होने वाले राष्ट्रीय स्तर के हिंदी दैनिक अख़बारों- दैनिक भास्कर नवभारत, नईदुनिया,दैनिक जागरण,पत्रिका,मुंबई से प्रकाशित धर्मयुग, दिनमान के पत्रकार रहे, करीब पांच शीर्ष इलेक्ट्रॉनिक चैनलों में भी बतौर रिपोर्टर के हाथ आजमाए। वर्तमान मे 'एमपी मीडिया पॉइंट' वेब मीडिया एवं यूट्यूब चैनल के प्रधान संपादक पद पर कार्यरत हैं। आप इतिहासकार भी है। श्री शर्मा द्वारा लिखित "पूर्वकालिक इछावर की परिक्रमा" इतिहास एवं शोध पर आधारित है। जो सीहोर जिले के संदर्भ में प्रकाशित पहली एवं बेहद लोकप्रिय एकमात्र पुस्तक में शुमार हैं। बीएससी(गणित) एवं एमए(राजनीति शास्त्र) मे स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के पश्चात आध्यात्म की ओर रुख किए हुए है। उनके त्वरित टिप्पणियों,समसामयिक लेखों,व्यंगों एवं सम्पादकीय को काफी सराहा जाता है। सामाजिक विसंगतियों, राजनीति में धर्म का प्रवेश,वंशवाद की राजसी राजनिति जैसे स्तम्भों को पाठक काफी दिलचस्पी से पढतें है। जबकि राजेश शर्मा खुद अपने परिचय में लिखते हैं कि "मै एक सतत् विद्यार्थी हूं" और अभी तो हम चलना सीख रहे है..... शैलेश तिवारी

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