मध्यप्रदेशसीहोर जिला

बाबा भारतीय को समझने के लिए उनकी पत्रकारिता समझें….

प्रसंगवश

जन्म जयंती विशेष— स्व. बाबा अंबादत्त भारती

बाबा भारतीय को समझने के लिए उनकी पत्रकारिता समझें….

22 मार्च 2026 बाबा भारतीय की 76 वीं जयंती

बकलम- जयंत शाह

किस्सा-1

“यारी-दोस्ती सही-सही, लिखतम पड़तम सही-सही”

बात है सन् 1980 के दशक की है, जब सीहोर में एक पुलिस अधीक्षक हुआ करते थे ,वे तत्कालीन समय में देश के बड़े प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते थे। कार्य शैली ऐसी कि, अपराधी तो खोफ खाते ही थे वहीं दूसरी तरफ जिला स्तर के प्रभावशाली नेता एवं पत्रकार भी उनके रुतबे से वाकिफ थे। परंतु शहर की आम जनता में उनकी मिलनसार छवि थी। जिला स्तर के सभी वरिष्ठ नेता एवं पत्रकारों से ना केवल उनका दोस्ताना व्यवहार था बल्कि किसी ने किसी रूप में सभी लोग उनके द्वारा ऑब्लाइज भी थे।
उन्हीं साहब के कार्यकाल में इच्छावर तहसील के ग्राम बिछोली में एक नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना हुई। 1980 के दशक में इस तरह की घटना होना सामान्य या मामूली बात नहीं थी…
परंतु पुलिस अधीक्षक की कार्यशैली और व्यवहार कुशलता के चलते प्रमुख समाचार पत्रों में उक्ताशय का समाचार या तो दिखा ही नहीं या सामान्य घटना के रूप में छप कर रह गया।
घटना के लगभग तीन या चार दिन बीत जाने के बाद भोपाल से प्रकाशित प्रमुख अखबार दैनिक जागरण, जिसके सीहोर संवाददाता बाबा अंबादत्त भारती थे। ने पूरी घटना को स्टोरी के रूप में ‌बहुत ही मार्मिक शब्दावली और तथ्यों के साथ बड़े रूप में प्रकाशित किया।
समाचार प्रकाशित होने के बाद इतना हंगामा हुआ कि भोपाल से डीआईजी न केवल बिछोली गांव के दौरे पर पहुंचे बल्कि पुलिस कंट्रोल रूम में जिले के पुलिस अधिकारियों की बैठक ली। साथ ही अपराधियों के पकड़े जाने से लेकर पूरी कार्रवाई नहीं हो जाने तक मॉनिटरिंग भी की गई। यह अलग बात है कि अपराधियों के पकड़े जाने के बाद मामला शांत हो गया।
पुलिस अधीक्षक महोदय एवं भारतीय जी की दोस्ती भी वैसी की वैसी बरकरार रही।
बाबा भारतीय कहा करते थे, “यारी दोस्ती सही-सही, लिखतम पड़तम सही-सही”

किस्सा 2:

“….शेष सभी विज्ञापन हैं”

बाबा भारती कहते थे- हर वह सूचना या घटना जिसे छुपाने या दबाने के लिए राजनेता, प्रशासन, रुतबे वाले और दबंग लोग प्रयास करें। उसे छाप देना ही समाचार है, बाकी सभी विज्ञापन है।

बात 1986 में हुए दंगों के समय की है,ऐसा माना जाता है और जो काफी हद तक सही भी है जब भी किसी प्रकार की दुर्घटना होती है तो सत्तासीन व्यक्तियों एवं प्रशासन द्वारा प्रभावितों की संख्या को कम करके बताया जाता है। बाबा भारतीय उस समय समाचार एजेंसी पीटीआई एवं दैनिक जागरण दोनों के संवाददाता के रूप में कार्यरत थे। दंगों में मरने वालों की संख्या सरकार द्वारा कम बताई जाती थी लेकिन पीटीआई एवं जागरण में एक या दो अंक अधिक रहते थे। पहले दिन जिला प्रशासन द्वारा खंडन किया जाता था फिर जब मृतकों के नाम ख़बर के माध्यम से उजागर होते तो बाद में प्रशासन को पुष्टि करना पड़ती थी कि प्रकाशित ख़बर के आंकड़े सत्य हैं। मजेदार बात यह कि सरकार के जिम्मेदार लोगों द्वारा अखबार के मालिकों से भी शिकायत की गई परंतु तथ्यों पर आधारित खबर को झूठलाया नहीं जा सकता था। नतीजतन समूच पाठकों सहित आम जनता सुबह से उठकर दैनिक जागरण अखबार की प्रतीक्षा करते थे। जिले में यात्री बसें बंद , प्रशानिक प्रतिबंध के बावजूद जोखिम उठाकर समाचार पत्र का सीहोर नगर सहित इछावर,नसरुल्लागंज,श्यामपुर आदि क्षेत्र में दौरान-ए-खास वितरण, बाबा भारतीय के मैदानी जंग की फतह को सीहोर की तारीख़ में आज भी एक मुकम्मल मुकाम दिए हुए है।

इसी प्रकार का एक अन्य वाक्या भी मुझे स्मरण में आता है जो बाबा के जीवन के अंतिम वर्षों से ताल्लुकात रखाता है।
दरअसल बाबा भारतीय अपने जीवन के अंतिम वर्षों में भी पत्रकारिता में पूरी जीवटता के साथ सक्रिय थे। सीहोर की बुधनी तहसील के सलकनपुर मेले में हुई भगदड़ मे लोगों की मृत्यु एवं हताहत होने का समाचार बाबा भारती ने लिख दिया था। जिसमे भी संख्या प्रशासन के अनुसार कम थी एवं बाबा भारतीय द्वारा प्रकाशित समाचार में अधिक दिखाई गई थी। प्रशासन द्वारा लगातार समाचार का खंडन किया जाता रहा समाचार पत्र के इंदौर स्थित मालिक से भी प्रशासन के उच्च अधिकारियों ने संपर्क किया परंतु भारतीय जी की विश्वसनीयता के आगे समाचार पत्र के मालिकान द्वारा प्रशासन की बात नहीं सुनी गई। शिकायत के बाद बाबा भारतीय ने मरने वालों के नाम एवं स्थान सहित समाचार फिर से प्रकाशित किया। जो जिला प्रशासन के लिए “मुंह की खाने” जैसा साबित हुआ।

किस्सा- 3

“गंगा-जमुनी” तहजीब  के पक्षधर बाबा भारती किसी भी विशेष तिथि या प्रसंग पर सीहोर के इतिहास की चर्चा होती थी तब बाबा भारतीय सीहोर की मिली जुली संस्कृति को प्रमुखता से अपनी लेखन शैली से प्रस्तुत करते थे। जब किसी मौके पर अंग्रेजों के विरुद्ध ‌सीहोर में हुई सैनिक क्रांति का जिक्र समाचार या लेख में बाबा भारती करते थे तो बाबा भारतीय द्वारा अपने लेखों में शाहिद “महावीर कोट” के साथ “वली शाह” का भी प्रमुखता से वर्णन किया गया। जो ऐतिहासिक पुस्तकों और तथ्यों पर आधारित रहता था। सिपाही बहादुर सरकार का वर्णन करते समय बाबा भारतीय निशान-ए-महावीरी और निशान-ए- मोहम्मदी दोनों झंडे कोतवाली सीहोर पर फहराने का भी जिक्र हमेशा ही करते थे।

अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हुए कुंवर चैन सिंह की शहादत का वर्णन करते समय उनके साथ शहीद हुए कुंवर चैन सिंह के दोनों सिपाहसलार हिम्मत खां एवं बहादुर खां का जिक्र भी अपनी लेखनी में प्रमुखता से करते थे।
जो ऐतिहासिक पुस्तकों के हवाले से तथ्यों पर आधारित रहते थे।
वर्तमान समय में प्रत्येक वर्ष शाहिद कुंवर चैन सिंह की समाधि पर होने वाले आयोजन में नरसिंहगढ़ रियासत के वारिस पूर्व मंत्री राजवर्धन सिंह लगभग प्रत्येक वर्ष पहुंचते हैं। राजवर्धन सिंह पूरे कार्यक्रम में किसी न किसी रूप से एक बार पत्रकार बाबा भारतीय का स्मरण अवश्य कर लेते हैं।

किस्सा- 4.                                                            

सीहोर नगर पालिका से एंटीक तोप चोरी होने का मामला

घटना सन् 1975 से 80 के दौर की है। इमरजेंसी का दौर था। सीहोर में एसडीओ थे ओपी शर्मा ।
शर्मा जी के पास ही नगर पालिका का भी चार्ज था। वही नगर पालिका प्रशासक‌ भी थे। बड़ी सख्त और दबंग छवि होने की छाप थी शर्मा जी की। अपने पॉवर और अपनी दबंग छवि का फायदा उठाते हुए सीहोर की धरोहर एक एंटीक तोप एंटीक वस्तुओं का कारोबार करने वाले को चुपचाप बेच दी। परंतु एसडीओ साहब यह भूल गए कि भले ही इमरजेंसी लगी हो या भले ही कितनी सख़्त छवि अपने आप की बना रखी हो कितने ही बड़े अधिकारी और राजनेताओं का वरदहस्त आपके ऊपर हो। सीहोर में बाबा भारती जैसे जागरुक पत्रकार होते हुए नियम विरुद्ध मनमानी नहीं कर सकते। बाबा भारती ने अपने साथ पत्रकार ऋषभ गांधी का सहयोग लेते हुए जब पूरे घटनाक्रम को समाचार पत्रों एवं न्यूज एजेंसियों के माध्यम से उजागर किया। दोनों पत्रकारों की कलम चलने के बाद सीहोर की धरोहर एंटीक तोप को वापस लाना मजबूरी हो गया। जो आज भी सीहोर में नगर पालिका भवन की ऊपरी मंजिल पर लगी हुई है।

किस्सा- 5

‘सेठ जी’ को समझाया नोटों की आंच का मतलब

बाबा भारती के व्यक्तित्व का एक पहलू यह भी था कि कोई अत्यधिक प्रभावशाली पूंजीपति, राजनेता, दबंग व्यक्ति , अधिकारी या स्वयंभू बुद्धिजीवी, व्यंग के रूप में कुछ ऐसी बात कह दे जो दिल मे चूभ जाए तो बाबा भारतीय मौका आने पर उसकी बात का एहसास भी करते थे और उसके द्वारा बोले गए वही शब्द रिपीट भी करते थे।
किस्सा है सीहोर जिले की तहसील के एक बड़े सेठ का जिससे बाबा भारतीय के दोस्ताना ताल्लुक थे एवं यादा-कदा वह सेठ जी बाबा को आर्थिक सहयोग भी करते थे। एक बार की मेरे आंखों देखी घटना है, बाबा किसी बात पर उन्हें सावधान रहने की समझाइश दे रहे थे सेठ ने कह दिया बाबा नोटों पर बड़ी आंच होती है। कुछ दिनों बाद उन सेठ जी के घर पर महिला उत्पीड़न संबंधी कुछ मामला हो गया महिला के परिवार जनों ने पुलिस केस कर दिया। थाने में पदस्थ एसडीओपी की बड़ी सख्त छवि थी। जब पुलिस का दबाव बड़ा और सेठजी बाबा के पास मदद मांगने आए तो बाबा ने जो उस समय ठंड में सीगड़ी (गुर्सी,अलाव) लगाकर ताप रहे थे सेठ जी के हाथ से नोटों का बंडल लेकर सिगड़ी मे जला डाला और दूसरा बंडल मांगा बाबा बोले नोटों की आंच देखना है सेठ जी। नोटों की आंच पूरी देखने के बाद ही एसडीओपी साहब से बात कर पाऊंगा।

बाबा भारती के इस व्यक्तित्व को मैं नहीं समझ पाया क्या बाबा का इस तरह का व्यवहार उचित था या अनुचित। आज मुझे लगता है शायद वह अपने पहलू पर सही थे।

मोरल ऑफ द स्टोरी

संक्षेप में सार यह है कि भारती जी की पत्रकारिता नेताओं, पूंजीपतियों, अधिकारियों के इर्द-गिर्द घूमने की अपेक्षा जन भावनाओं को अधिक से अधिक तवज्जो देती थी। परिणाम यह था कि राजनेता और अधिकारी अखबारों में छपी खबर को महत्व भी देते थे और उचित लगने पर खबर के आधार पर कार्रवाई भी करते थे। जन भावनाओं को नजरअंदाज करके मनमानी करने का साहस नहीं जुटा पाते थे।

जयंत शाह, सीहोर

राजेश शर्मा

राजेश शर्मा मप्र से प्रकाशित होने वाले राष्ट्रीय स्तर के हिंदी दैनिक अख़बारों- दैनिक भास्कर नवभारत, नईदुनिया,दैनिक जागरण,पत्रिका,मुंबई से प्रकाशित धर्मयुग, दिनमान के पत्रकार रहे, करीब पांच शीर्ष इलेक्ट्रॉनिक चैनलों में भी बतौर रिपोर्टर के हाथ आजमाए। वर्तमान मे 'एमपी मीडिया पॉइंट' वेब मीडिया एवं यूट्यूब चैनल के प्रधान संपादक पद पर कार्यरत हैं। आप इतिहासकार भी है। श्री शर्मा द्वारा लिखित "पूर्वकालिक इछावर की परिक्रमा" इतिहास एवं शोध पर आधारित है। जो सीहोर जिले के संदर्भ में प्रकाशित पहली एवं बेहद लोकप्रिय एकमात्र पुस्तक में शुमार हैं। बीएससी(गणित) एवं एमए(राजनीति शास्त्र) मे स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के पश्चात आध्यात्म की ओर रुख किए हुए है। उनके त्वरित टिप्पणियों,समसामयिक लेखों,व्यंगों एवं सम्पादकीय को काफी सराहा जाता है। सामाजिक विसंगतियों, राजनीति में धर्म का प्रवेश,वंशवाद की राजसी राजनिति जैसे स्तम्भों को पाठक काफी दिलचस्पी से पढतें है। जबकि राजेश शर्मा खुद अपने परिचय में लिखते हैं कि "मै एक सतत् विद्यार्थी हूं" और अभी तो हम चलना सीख रहे है..... शैलेश तिवारी

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