“नेता कभी कलेक्टर नहीं बन सकता लेकिन कलेक्टर जब चाहे नेता बन सकता है”
श्वान, सत्ता,सनकी और सीहोर...

“नेता कभी कलेक्टर नहीं बन सकता लेकिन कलेक्टर जब चाहे नेता बन सकता है”
राजेश शर्मा
श्वान के सहारे सत्ता तक पहुंचने के कांग्रेसी प्रयास सीहोर से शुरु तो हो गए लेकिन श्वान तो श्वान ही होता है उसमे सूंघने की क्षमताएं भी अद्भुत रहती है। और उसके प्रयोग करने से पहले बकायदा ट्रेनिंग की जरुरत होती है नहीं तो वह मालिक को ही उल्टा शिकार बना सकता है…कहीं ऐसा न हो जाए।
जब हमारी भाषा अशिष्टता की पराकाष्ठा को प्राप्त होती है तो हम श्वान को “कुत्ता” कहने लगते हैं। यानि जब कुत्ते को रोटी डाली जाती है तो वह जानवर और जब उसी को भोग दिया जाता है तो वही कुत्ता ‘श्वान’ रुप में आ जाता है।
गौ माता, श्वान एवं कौआ कहां पर आदरणीय हैं यह बताने की जरुरत किसी सनातनी धर्मावलंबी को नहीं है। कुत्ते के गले में ज्ञापन, ‘कलेक्टर’ नाम की तख्ती टांगना और कान में धीरे से कुछ कहना और और फिर तेज आवाज़ में दहाड़ना यह किस बात की निशानी है ?
इससे तो ज्यादा बेहतर होता कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार भगतसिंह की नीति पर चलते और पर्चियां फैलाकर तेज दहाड़ते हुए बोलते “गूंगी और बहरी हुकूमत को सुनाने-जगाने के लिए धमाकों की तेज आवाज़ जरुरी है” इंकलाब जिंदाबाद…
माना कि प्रजातंत्र के अच्छे स्वास्थ्य के लिए शशक्त विपक्ष का होना उतना ही जरुरी है जितना की मनुष्य को जीवन के लिए आक्सीजन…लेकिन इसका मतलब यह नहीं आपकी शशक्ता मनोरोग से जुड़ने लगे। आप 16 जून 2023 से मध्यप्रदेश की विधानसभा में ‘नेता प्रतिपक्ष’ हैं। आप भले ही विपक्ष में हैं लेकिन ‘पदयुक्त’ हैं और हर पद की अपनी एक गरीमा होती है। उसे बचाकर रखना आपका ही दायित्व है। आपा खो देना क्या आपकी कमजोरियां उजागर नहीं करता?
सीहोर में कांग्रेस किसानों के लिए प्रदर्शन कर रही थी या दिखावा…लगातार सत्ता से बाहर रहने की थकावट ने चेहरे को उत्तेजित और जुबां को अनियंत्रित बना दिया जिसका नतीजा यह निकला कि जहां आपको आम जनता का जबरदस्त समर्थन मिलना था वहां पूरा मुद्दा सिर्फ सोशल मीडिया की सुर्खियों तक सिमट कर रह गया।
और एक बात यह भी है कि सीहोर कलेक्टर द्वारा अपनी अनुपलब्धता से पहले ही कांग्रेस को अवगत करा दिया जाता तो शायद यह नौबत आती ही नहीं! कलेक्टर किसी पार्टी का नहीं होता। माना कि शासन का होता है लेकिन मप्र के किसी भी आला अफसर का चेहरा “हाथ का पंजा” या “कमल का फूल” जैसा नहीं दिखना चाहिए। यदि ऐसा है तो यह पद की गरिमा के साथ खिलवाड़ के अलावा कुछ नहीं।
नैतिकता के दायरे में दरारें लाने वाले अफसर “नई सोच-नया मध्यप्रदेश” का लक्ष्य रखें विज़न- 36, अपने अधिकारों का सदुपयोग करें तो कई नौबतें टाली जा सकती हैं। जनजागरुकता का अभियान चलाना और जनप्रतिनिधियों तक का फोन नहीं उठाना…यह क्या है!!
विपक्ष को रीड़हीन,अपंग समझना यह समझदारी है…चालाकी है, नादानी है या सत्तापक्ष की चापलूसी…! परिवर्तन संसार का नियम है और इस नियम के दायरे में हम,आप,मद्,पद और “सत्ता” सभी आते हैं। मान्यवर यह मत भूलिए।
और अंत में बड़बोले नेताओं को यह अंतर भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिए, भले ही वह भाजपा,कांग्रेस या अन्य किसी भी राजनीतिक दल के हों…कि
“नेता कभी कलेक्टर नहीं बन सकता लेकिन कलेक्टर जब चाहे नेता बन सकता है”।



