
शार्ट फ़िल्म ‘गांव की छांव’ में निभाया सीहोर के शेलेंद्र गोहिया ने मुख्य किरदार,
महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी पुणे फ़िल्म फेस्टिवल में हुआ चयन
मुंबई/सीहोर, 12 जनवरी 2025
एमपी मीडिया पॉइंट
कल 11 जनवरी को मिटी संस्था द्वारा महाराष्ट्र की साँस्कृतिक राजधानी पुणे में आयोजित 5वे फिल्म फेस्टिवल में चयनित “गांव की छाँव” फिल्म की स्क्रीनिंग की गई।
इस फिल्म में मुख्य किरदार सीहोर के प्रतिभाशाली थियेटर कलाकार शैलेंद्र गोहिया ने दादाजी के रूप में निभाया है। सभी का दिल जीतने वाले पोती के किरदार को नन्ही कलाकार श्रव्या साल्वी ने निभाया है। जानकारी के अनुसार मिटी को लगभग 500 शॉर्ट फिल्म और डाक्यूमेंट्री की प्रविष्टियां प्राप्त हुई थीं। जिसमेंमे गांव की छांव फ़िल्म का भी चयन हुआ था। तमाम दर्शकों ने फिल्म समाप्त होने के बाद करतल ध्वनि से कलाकारों की जमकर प्रशंसा की।
आयोजकों द्वारा युवा निर्देशक आदित्य बंग और शैलेंद्र गोहिया को मंच पर आमंत्रित कर स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया।
फ़िल्म फेस्टिवल के इस आयोजन को महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने प्रायोजित किया था और अन्य संस्थाओं ने सह प्रयोजन किया था। फेस्टिवल में पर्यावरण और प्रदूषण नियंत्रण पर आधारित फिल्म और डाक्यूमेंट्री का चयन किया गया था।
*गांव की छांव फिल्म का सारांश*
गांव की छांव फिल्म शहर और गाँव के जीवन में अन्तर और ग्रामीण अंचल की सुख शांति को आधार मानकर बनाई गई है।
फ़िल्म में बताया गया है कि दादा और पोती के प्रगाढ़ स्नेह और दादा द्वारा पोती को सीख सीख दी गई है कि हमे अविष्कारों का नाजायज़ प्रयोग नहीं करना चाहिए। अन्यथा पृथ्वी का विनाश हो सकता है। दादा यह बातें अपनी पोती को रोचक कहानी के माध्यम से बताते हैं।
इस फ़िल्म में प्रतीक साल्वी और नेहा भट्ट ने पोती के माता-पिता का किरदार निभाया है जो मराठी टीवी के जाने-माने नाम हैं। साथ ही संगीत सुयोग साल्वी ने दिया है और सिनेमाटोग्राफी पुणे के अथर्व शुक्रे ने की है। फिल्म का निर्माण और निर्देशन नासिक के आदित्य बंग ने किया है। इस फ़िल्म को महाराष्ट्र के सुरम्य क्षेत्र कोंकण के गुहागर के समुद्री तट पर और मलन पाखारवाडी, जिला रत्नागिरी, महाराष्ट्र में फ़िल्माया गया है।
पाखारवाडी गाँव की खास विशेषता यह है कि सामाजिकता बनाए रखने हेतु अब तक गाँव में मोबाइल टावर लगाने की अनुमति नहीं दी है ताकि लोग एकदूसरे से जुड़े रहें। हालांकि मोबाइल कंपनियों के आकर्षक और लुभावने पैकेज ग्राम के लिए ऑफर किए गए थे जिन्हें ग्रामीणों ने नकार दिया है। यह गांव अब भी सोशल मीडिया के चंगुल से काफी हद तक बचा हुआ है। कुल मिलाकर यह फ़िल्म संदेश देती है कि जीवन की आपाधापी में लोगों के पास समय का अभाव है। टीवी, मोबाइल हमारे समय को खाये जा रहा है और रिश्ते एकाकी होते जा रहे हैं। ऐसे में जो भी समय बचा हुआ है उसे हमे आपस में मिलजुल कर सुख और शांति पूर्वक बिताना चाहिए।



