
यह तो अधिकारी जाने कितना सही कितना गलत…लेकिन सबक आखिर कब ? 
राजेश शर्मा
सड़क दुर्घटनाओं में होते इज़ाफे को लेकर चिंता सभी को है लेकिन समाज सबक सीखता नहीं,पुलिस प्रशासन कायदे से एक्शन लेता नहीं तब कैसे दुर्घटनाओं पर रोकथाम संभव है?
इंदौर में हुआ सड़क हादसा एवं आष्टा में पदस्थ महिला पुलिस इंस्पेक्टर की थार से हुए एक्सीडेंट कई सवालों को जन्म दे रहे हैं। आखिर क्यों मृतक के परिजनों को सीहोर में धरना देने की नौबत आई? गिरफ्तारी और निलंबन की मांग के बाद अगर निर्णायक कार्रवाई होती है तो फिर पुलिस की फुर्ती और निष्पक्षता कहां खो गई थी ?
बात इतनी सी है कि चाहे मनुष्य मादक पदार्थ का सेवन करे या ओहदे के मद में रहे, फर्क स्टेयरिंग पर आता ही है। इंदौर का जिक्र करें तो कार दुर्घटना में पूर्व मंत्री बाला बच्चन की बेटी,प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता के बेटे सहित तीन ने जान गंवाई। दुर्घटना का कारण वही तेज स्पीड और नशा!!जन्मदिवस के अवसर पर मौत का पैगाम कितना दुखद है यह वही समझ सकता है जिसके साथ हादसा हुआ लेकिन आगे लोगों के लिए लापरवाही भी सबक बनती है लेकिन नहीं क्योंकि कोई हादसों से सबक सीखना नहीं चाहता। पुलिस, प्रशासन और यातायात पुलिस भी।
आज सड़क दुर्घटनाओं के मामले में अगर हालात बेकाबू हैं तो इसके पीछे सीधे-सीधे पुलिस प्रशासन दोषी है। यदि आंकड़ों की बात की जाये तो दुर्घटनाओं मे सर्वाधिक मौतें डम्परों से हो रही हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इन जानलेवा डम्पर मालिकों के तार दलालों से जुड़े हुए हैं और संबधित विभाग एवं पुलिस का ‘हफ़्ता’ बंधा हुआ है!
प्रदेश में अनगिनत वाहन बगैर कागजात के दौड़ रहे हैं, ड्राइवरों के पास लाइसेंस तक नहीं रहते,खस्ताहाल डम्परों की अंधी रफ्तार पुलिस को दिखाई नहीं देती क्योंकि कानून अंधा है!!
बेबस सिर्फ़ नागरिक हैं जो बिगड़ेल व्यवस्था पर छाती पीटने के लिए मजबूर है। असामयिक मौतों से रीड़हीन पुलिस प्रशासन क्या सबक लेगा और क्या व्यवस्था मे बदलाव करेगा इसका नतीजा तो भविष्य ही तय करेगा?
सड़क दुर्घटनाओं की रोकथाम एवं नशामुक्ति के लिए समय-समय पर पुलिस विभाग द्वारा जनजागरूकता अभियान चलाए जाते हैं लेकिन इन अभियानों का असर नहीं दिखाई दे रहा। वाहनों की अंधी रफ्तार,यातायात कानूनों का उल्लंघन, सड़क पर दौड़ते कंडम वाहन,बगैर नम्बर प्लेट की मोटरसाइकिलें, अवयस्कों के हाथों में बाइक-स्कूटी, ढाबों में बिकती अवैध शराब और जिस्म फरोशी के धंधे…क्या किसी से छिपे हुए हैं?
क्या यह सच है कि राजनितिक दबाव,ट्रांस्फर का डर,लूप लाइन में पटके जाने का खौफ़ पुलिस अधिकारियों के हाथ बांधे हुए है। यह तो अधिकारी ही जाने कितना सही कितना गलत…लेकिन सबक आखिर कब ?



